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सोमवार, मई 31, 2010

मनोज बाजपेयी की पीड़ा

मनोज बाजपेयी...कला के धनी अभिनेता....उनका एक ब्लॉग है॥आज विचरते हुए पहुँच गया उनके ब्लॉग पर..कई पोस्ट पढ़े...पोस्ट का पोस्टमार्टम भी किया...उनके एक लेख ने मुझे काफी प्रभावित किया.....चर्चा का विषय था उनकी ही की फिल्म स्वामी और 1971(आप कही यह नाम सुनकर चौंक गए हो). मैंने ये दोनों फिल्मे देखी थी...सो सारा माजरा क्लियर हो गया..दरअसल, इतनी बेहतरीन फिल्म आम लोगो के पास नहीं पहुँच पाई..इसका दुःख मनोज को भी है और उनके पोस्ट को पढने के बाद मुझे भी...उनके इस लाइन ने तो हृदय को रुला दिया..

"मैं अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘1971’ को मानता हूं। इसी फिल्म को इस साल बेस्ट हिन्दी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है। लेकिन, इस फिल्म की खराब पब्लिसिटी का ही नतीजा था कि दर्शकों को इस फिल्म के बारे में पता नहीं चला। टेलीविजन पर लोग फिल्म देखकर अब फोन करते हैं और पूछते हैं कि ये कौन सी फिल्म है, जिसमें मैंने इतना बढ़िया अभिनय किया है। "

मेरा माननाहै किप्रचार तंत्र ने इस फिल्म की सफलता पर रंदा मार दिया...

पढ़िए मनोज का ही आलेख उन्ही के ब्लॉग से..
प्रचार बिन सब सून

अपनी नयी फिल्म ‘जेल’ के प्रमोशन के लिए मैं फैशन वीक में रैंप पर उतरा तो कई लोगों ने मुझसे एक सवाल किया कि क्या रैंप पर उतरना फिल्म कलाकारों के लिए अब फैशन हो गया है? या इस हथकंडे से फिल्म के सफल होने की गारंटी मिल जाती है? ये सवाल शायद इसलिए भी बार बार पूछा गया क्योंकि रैंप पर ‘जेल’ के सभी सदस्य यानी मैं, नील, मुग्धा और डायरेक्टर मधुर भंडारकर साथ-साथ उतरे और मैंने और नील ने तो कैदी की यूनिफॉर्म पहनी थी, और हाथ में हथकड़ी लगायी हुई थी। लेकिन, बात रैंप पर चलने की नहीं, इस बारे में पूछे गए सवालों की है।

फिल्म के प्रमोशन के लिए रैंप पर चलना इन दिनों आम हो गया है-इसमें कोई शक नहीं है। दरअसल, कंज्यूमरिज़्म के इस दौर में फिल्म भी एक प्रोडक्ट है और बॉलीवुड को यह बात अब अच्छी तरह समझ आ चुकी है। एक प्रोडक्ट को बेचने के लिए जिस तरह एडवरटाइजिंग की जरुरत होती है,उसी तरह फिल्म को बेचने के लिए भी एडवरटाइजिंग की जरुरत होती है। लेकिन, फिल्म और दूसरे प्रोड्क्ट में एक बड़ा अंतर यह है कि फिल्म का हश्र रिलीज के तीन दिनों के भीतर तय हो जाता है। ऐसे में, फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए जिन जिन तरीकों या कभी कभार हथकंडों की जरुरत होती है, उनका सहारा लिया जाता है। रैंप पर चलना सबसे सस्ते तरीकों में हैं,जहां आप कोई रकम खर्च नहीं कर रहे अलबत्ता पब्लिसिटी बटोर रहे हैं।
बहुत से लोग इस बारे में सवाल कर सकते हैं कि क्या पब्लिसिटी से फिल्म हिट हो सकती है? क्योंकि कई बड़े बजट की फिल्मों को धुआंधार पब्लिसिटी के बावजूद औंधे मुंह गिरते लोगों ने देखा है। जी हां, इसमें कोई दो राय नहीं है कि सिर्फ पब्लिसिटी ही सब कुछ नहीं होती। लेकिन,माफ कीजिए बहुत कुछ होती भी है। आखिर,दर्शकों को रिलीज हुई फिल्म के बारे में पता तो चलना चाहिए। उस फिल्म की कहानी-कलाकार आदि के बारे में कुछ तो पता होना चाहिए, तभी तो वो थिएटर तक फिल्म देखने की मशक्कत करेगा।
करियर के शुरुआती दौर में मैं पब्लिसिटी को अहम नहीं मानता था। लेकिन, अब मुझे लगता है कि मैं गलत था। दरअसल, अपनी फिल्मों की खराब पब्लिसिटी का हश्र मैंने कई बार भुगता है। मेरी फिल्म ‘स्वामी’ को आलोचकों ने बहुत सराहा, लेकिन फिल्म पिट गई क्योंकि दर्शकों को इसके बारे में पता ही नहीं चला कि फिल्म कब आई और कब गई। मैं अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘1971’ को मानता हूं। इसी फिल्म को इस साल बेस्ट हिन्दी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है। लेकिन, इस फिल्म की खराब पब्लिसिटी का ही नतीजा था कि दर्शकों को इस फिल्म के बारे में पता नहीं चला। टेलीविजन पर लोग फिल्म देखकर अब फोन करते हैं और पूछते हैं कि ये कौन सी फिल्म है, जिसमें मैंने इतना बढ़िया अभिनय किया है। हाल में प्रदर्शित हुई एसिड फैक्ट्री के बारे में भी मेरा यही मानना है कि फिल्म की पब्लिसिटी ठीक नहीं हुई।
आज के युग में फिल्मों के प्रचार प्रसार के लिए जरुरी है कि आप यानी कलाकार और फिल्म से जुड़े लोग हर संभव मंच से चिल्ला चिल्लाकर बताएं कि अमुक फिल्म रिलीज हो रही है। लोग कहते हैं कि क्या अब माउथ पब्लिसिटी के लिए कोई जगह नहीं है। तो मेरा यही मानना है कि नहीं है। वो इसलिए क्योंकि फिल्म का धंधा सिर्फ तीन दिनों का है,क्योंकि अगर तीन दिनों के भीतर लोग थिएटर तक नहीं पहुंचे तो फिर अगले हफ्ते तीन-चार फिल्में रिलीज के लिए तैयार होती हैं।
निश्चित तौर पर छोटे निर्माताओं को अपनी फिल्म के प्रचार में अब खासी मुश्किलें आती हैं, और उनके लिए यही रास्ता है कि वो सभी मुमकिन मंच से फिल्म का प्रचार करें। रिएलिटी शो में जाएं, रैंप पर कलाकारों को उतारें, वेबसाइट पर चैट करें वगैरह वगैरह। कुल मिलाकर सच्ची बात यही है कि बिन प्रचार सब सून है। दर्शकों द्वारा फिल्म पसंद या खारिज तो तब की जाएगा,जब बड़ी संख्या में लोग फिल्म को देखें और बिना पब्लिसिटी यह मुमकिन नहीं है। इसलिए ‘जेल’ या अपनी किसी दूसरी फिल्म के लिए जब मैं रैंप पर उतरता हूं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं चाहता हूं कि लोग फिल्म को देखने के बाद अपना फैसला दें।
इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
इस लेख को पढने के बाद स्वामी और 1971जरूर देखे..

3 टिप्‍पणियां:

  1. मनोज वाजपेयी की चिंता जायज है। आजकल प्रचार के बिना अच्छी चीज भी दबकर रह जाती है। अतः मनोज की पीड़ा समझी जा सकती है।

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  2. मैं तो मनोज जी का पुराना पंखा हूँ जी.. और मैंने तक स्वामी तो देखी हुई है पर १९७१ नहीं.. :( जल्द ही देखूँगा. आभार

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  3. प्रचार के बिना अच्छी चीज भी दबकर रह जाती है।

    ---- eksacchai { AAWAZ }


    http://eksacchai.blogspot.com

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