आवाज़ निकलेगी तो दूर तलक जाएगी...

Thursday, December 29, 2011

अन्ना अब जंतर-मंतर से हडताली चौक !

लोकपाल बनाम जनलोकपाल, सरकार बनाम जनता कैसे बना इसका जीता-जागता मिसाल अन्ना हजारे का आन्दोलन है. अन्ना हजारे के आन्दोलन का साक्षी वर्ष 2011 भी रहा. कांग्रेस की फजीहत सड़क से संसद तक हुई, जंतर-मंतर से सारे जहाँ में हुयी. कारण जिद! सरकार की जिद! जब पास करेंगे तो लोकपाल ही..कुछ इगो टाइप सीन दिखा सरकारी नुमाइंदों में. नतीजा, सिर्फ सरकार की फजीहत, फजीहत, फजीहत! ये फजीहत मेरे तीन बार कह देने से ही फजीहत नहीं हुयी. केंद्र सरकार के चौका घर (किचेन) कैबिनेट के अड़ियल रवैये से हुयी है. एक बार हुयी, दो बार हुयी, तीन बार हुयी, बहुतेरे बैठके और बहुतेरे फजीहते (व्याकरण से पैदल) . प्रणव-क-पी.-लमान की चौकड़ी ने २०११ में कांग्रेस की सब कुछ मतलब सबकुछ (....) एक करा दी. अब पटना की घटना नीतीश कैसे बन जायेंगे, वो भी लोकपालिये लहजे में! तो बात साफ़ है- लोकपाल अगर जनलोकपाल के आगे नक्कारखाने की तूती साबित हो सकती है तो बिहारी लोकायुक्त अन्नायी लोकायुक्त के आगे पटना की घटना बन जाए इसमें कोई अतिशयोक्ति न होगी. और अन्ना हडताली चौक पर धरना देते नजर आयें तो आश्चर्य न होगा. दरअसल, सुशासन बाबू इन दिनों अपने राज्य में अपना लोकायुक्त बिल को लागू करने का राग अलाप रहे हैं और बीते दिनों बाबू अरविन्द इस बिल पर पर रेड सिग्नल दे चुके हैं. सो, चूका-चुके-चूकि से नीतीश कोई चूक न कर बैठे और 2012 उनके लिए घटा-घटे-घटी न साबित हो जाए.

- सौरभ के.स्वतंत्र

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Thursday, November 10, 2011

साठ लाख बच्चे सड़क पर उतरेंगे!

शिक्षा के क्षेत्र में पैदल रहा बिहार अब तक तक़रीबन पचास से साठ हज़ार निजी विद्यालयों पर आश्रित है. आई.ए.एस. और आई.पी.एस. के उत्पादक बिहार में लगभग साठ लाख बच्चे अपना पठन-पाठन निजी विद्यालयों से करते आ रहे हैं. तब जाकर पैदल बिहार की कमर कुछ हद तक सुरक्षित है. देश में आर.टी.ई. के लागू होने के बाद बिहार का मानव संसाधन विभाग जिस तरीके से निजी विद्यालयों की स्वायत्तता पर अंकुश लगाने की तैयारी कर रही उस लिहाज से बिहार में शिक्षा की गुणवत्ता का और बंटाधार होने जा रहा है इसमें कोई शक नहीं. पच्चीस प्रतिशत गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना तो आर.टी.ई. का अच्छा प्रावधान है पर निजी विद्यालयों के प्रबंधन समिति में बाहरी घुसपैठ बरास्ता सरकार निहायत चिंतनीय है. निजी विद्यालय कालांतर में आपसी प्रतिस्पर्धा से शिक्षा की गुणवत्ता को बनाये रखने का प्रयास करते दीखते रहें.
अब जब सरकार विद्यालय प्रबंधन समिति में कुछ गवई और सरकारी लोगों को लाने के लिए विद्यालयों को प्रस्वीकृति कराने का दबाव डाल रही है तो इन साठ हज़ार विद्यालयों का भविष्य सरकारी विद्यालयों से भी ज्यादा अंधकारमय दिख रहा है. इस लिहाज से निजी विद्यालयों के लगभग साठ हज़ार संचालको , पचास से साठ लाखबच्चों तथा उनके अभिभावकों का सड़क पर उतरना स्वाभाविक है..!


- सौरभ के.स्वतंत्र

Monday, October 31, 2011

विश्व के सात अरबवे संतान का जन्म और दूरबीन!


पेट्रोल एक हज़ार रुपये प्रति लीटर, चीनी पांच सौ रुपये प्रति भर, दाल आठ सौ रुपये प्रति रत्ती , सब्जी सात सौ रुपये प्रति दस ग्राम, चावल तीन सौ रुपये प्रति तोला. यह तस्वीर हमारे आने वाले कल की है. दरअसल, इस तस्वीर के पीछे जो बैकग्राउंड है वह बढ़ती जनसँख्या का है. आज पूरे विश्व की आबादी सात अरब पहुँच गयी है और उसमे भारत का योगदान सवा अरब का है. सो,चिंता लाजिमी है. जगह यानी क्षेत्रफल निर्धारित है और उसी में अपनी जनसँख्या को भी सेटल करना है और अपने उत्पाद को भी मांग के हिसाब से बढ़ाना है. लिहाजा, जगह की मारामारी तो अभी से शुरू हो गयी है. अग़र हम अपने चश्मे का पावर और बढ़ा कर देखे तो आने वाले समय की तस्वीर स्पष्ट हो जायेगी. जल, जंगल और जमीन तीनों के लिए युद्ध होने के संकेत मिल रहे हैं. सड़क पर बढ़ते ट्रेफिक की बात की जाए तो सरकार को अब लोगो को शिफ्ट में चलने का मास्टर प्लान तैयार करना पड़ेगा इसमें कोई दो राय नहीं है. लोगों को शिफ्ट में सोना पड़े इसमें भी कोई शक नहीं है और उगते भारत में गिरते लिंग अनुपात के चलते महिलाओं के साथ छेड़खानी के मामले फ़्लू की तरह बढे तो कोई आश्चर्य न होगा. भारत की द्रुत गति से बढ़ती जनसँख्या पर सयुंक्त राष्ट्र संघ ने भी चिंता जताई है और भारत को आगाह भी किया है. यानी अलार्म बज चुका है.

पर बिडम्बना यह है कि भारत में जनसँख्या के बढ़ने पर कोई अंकुश लगाने के ठोस उपाए नहीं हो रहे. जरा सोचिये! क्या जमीं को बढाया जा सकता है, क्या संसाधनों को बढाया जा सकता है, क्या उत्पाद को मांग के हिसाब से बढाया जा सकता है? नहीं, लिहाजा अगर इंधन, दाल, चावल, सब्जी तोला और भरी के हिसाब से आसमानी कीमत पर बिके तो कोई आश्चर्य नहीं होगा. क्योंकि, विश्व का सात अरबवा भाई आ चुका है..जरा दूरबीन से देखिये भविष्य!

- सौरभ के.स्वतंत्र


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Friday, October 28, 2011