सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

बुधवार, मई 26, 2010

जनगणना में जातियों की गिनती के पक्ष में हम क्यों हैं?

मोहल्ला लाइव पर संयुक्त रूप से जारी किये गए इस लेख पर लाइव बहस छिड़ी हुई है. चुकी अभी देश में हाऊसिंग सेन्सस किया जा रहा है और फिर तुरंत बाद जनगणना किया जायेगा... लिहाजा सवाल यह उठाया जा रहा है कि जनगणना में हम जातियों की गिनती के पक्ष में क्यों हैं..? इस पर तमाम ज्ञानियों और बुद्धिजीवियों ने बहस छेड़ रखी...बता दे कि उसका सच ने भी जातिवाद का जहर नाम से एक बहस छेड़ रखी है... सो पेश है देश के कुछ जमीन से जुड़े पत्रकारों की राय और हम आभारी हैं मोहल्ला लाइव के..
--------------------------------------------------
देश में 80 साल बाद एक बार फिर से जाति-आधारित जनगणना की संभावना बन रही है। संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की अंतिम बैठकों में जनगणना में अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक समुदायों की तरह अन्य जातियों की भी गणना किये जाने की पुरजोर ढंग से मांग उठी। बहस के दौरान इस पर सदन में लगभग सर्वानुमति सी बन गयी, जिसकी सरकार ने कल्पना तक नहीं की थी। सभी प्रमुख दलों के सांसदों ने माना कि जाति भारतीय समाज की एक ऐसी सच्चाई है, जिससे भागकर या नजरें चुराकर जातिवाद जैसी बुराई का खात्मा नहीं किया जा सकता है। सामाजिक न्‍याय, एफर्मेटिव एक्शन और सामाजिक समरसता के लिए जाति-समुदायों से जुड़े ठोस आंकड़ों और सही कार्यक्रमों की जरूरत है। यह तभी संभव होगा, जब जनगणना के दौरान जातियों की स्थिति के सही और अद्यतन आंकड़े सामने आएं।

पता नहीं क्यों, ससंद और उसके बाहर सरकार द्वारा इस बाबत दिये सकारात्मक आश्वासन और संकेतों के बाद कुछ लोगों, समूहों और मीडिया के एक हिस्से में जाति-आधारित जनगणना की धारणा का विरोध शुरू हो गया। हम ऐसे लोगों और समूहों के विरोध-आलोचना का निरादर नहीं करते। लोकतंत्र में सबको अपनी आवाज रखने का अधिकार है। पर ऐसे मसलों पर सार्थक बहस होनी चाहिए, ठोस तर्क आने चाहिए। किसी संभावित प्रक्रिया के बारे में जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने और फतवे देने का सिलसिला हमारे लोकतंत्र को मजबूत नहीं करेगा। सरकार पर एकतरफा ढंग से दबाव बनाने की ऐसी कोशिश जनता के व्यापक हिस्से और संसद में उभरी सर्वानुमति का भी निषेध करती है। बहरहाल, हम जाति-आधारित जनगणना पर हर बहस के लिए तैयार हैं। अब तक उठे सवालों की रोशनी में जाति-गणना से जुड़े कुछ उलझे सवालों पर हम संक्षेप में अपनी बात रख रहे हैं -
(1) जनगणना में अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक-समूहों की गिनती हमेशा से होती आ रही है। सन 1931 और उससे पहले की जनगणनाओं में हर जाति-समुदाय की गिनती होती थी। सन 1941 में दूसरे विश्वयुद्ध के चलते भारतीय जनगणना व्यापक पैमाने पर नहीं करायी जा सकी और इस तरह जातियों की व्यापक-गणना का सिलसिला टूट गया। आजादी के बाद भारत सरकार ने तय किया कि अनुसूजित जाति-जनजाति के अलावा अन्य जातियों की गणना न करायी जाए। पिछली जनगणना में भी ऐसा ही हुआ, सिर्फ एससी-एसटी और प्रमुख धार्मिक समुदायों की गणना की गयी थी। पर इसके लिए कोई ठोस तर्क नहीं दिया गया कि अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक समूहों की गणना के साथ अन्य जातियों की गिनती कराने में क्या समस्या है। हमें लगता है कि आज संसद में बनी व्यापक सहमति के बाद वह वक्त आ गया है, जब जनगणना के दौरान फिर से सभी जातियों-समुदायों की गिनती करायी जाए। सिर्फ ओबीसी नहीं, अन्य सभी समुदायों को भी इस गणना में शामिल किया जाए। भारतीय समाज के समाजशास्त्रीय-नृतत्वशास्त्रीय अध्ययन के सिलसिले में भी जनगणना से उभरी सूचनाएं बेहद कारगर और मददगार साबित होंगी।
(2) समाज को बेहतर, सामाजिक-आर्थिक रूप से उन्नत और खुशहाल बनाने के लिए शासन की तरफ से सामाजिक न्याय, समरसता और एफर्मेटिव-एक्शन की जरूरत पर लगातार बल दिया जा रहा है। ऐसे में सामाजिक समूहों, जातियों और विभिन्न समुदायों के बारे में अद्यतन आंकड़े और अन्य सूचनाएं भी जरूरी हैं। जातियों की स्थिति को भुलाने या उनके मौजूदा सामाजिक-अस्तित्व को इंकार करने से किसी मसले का समाधान नहीं होने वाला है।
(3) कुछेक लोगों और टिप्पणीकारों ने आशंका प्रकट की है कि जाति-गणना से समाज में जातिवाद और समुदायों के बीच परस्पर विद्वेष बढ़ जाएगा। यह आशंका इसलिए निराधार है कि अब तक अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक समूहों की गिनती होती आ रही है, पर इस वजह से देश के किसी भी कोने में जातिगत-विद्वेष या धार्मिक-सांप्रदायिक दंगे भड़कने का कोई मामला सामने नहीं आया। जातिवाद और सांप्रदायिक दंगों के लिए अन्य कारण और कारक जिम्मेदार रहे हैं, जिसकी समाजशास्त्रियों, मीडिया और अन्य संस्थानों से जुड़े विशेषज्ञों ने लगातार शिनाख्त की है।
(4) जनगणना की प्रक्रिया और पद्धति पर सवाल उठाते हुए कुछेक क्षेत्रों में सवाल उठाये गये हैं कि आमतौर पर जनगणना में शिक्षक भाग लेते हैं। ऐसे में वे जाति की गणना में गलतियां कर सकते हैं। यह बेहद लचर तर्क है। जनगणना में आमतौर पर जो शिक्षक भाग लेते हैं, वे स्थानीय होते हैं। जाति-समाज के बारे में उनसे बेहतर कौन जानेगा।
(5) कुछेक टिप्पणीकारों ने यह तक कह दिया कि दुनिया के किसी भी विकसित या विकासशील देश में जाति, समुदाय, नस्ल या सामाजिक-धार्मिक समूहों की गणना नहीं की जाती। अब इस अज्ञानता पर क्या कहें। पहली बात तो यह कि भारत जैसी जाति-व्यवस्था दुनिया के अन्य विकसित देशों में नहीं है। पर अलग-अलग ढंग के सामाजिक समूह, एथनिक ग्रुप और धार्मिक भाषाई आधार पर बने जातीय-समूह दुनिया भर में हैं। ज्यादातर देशों की जनगणना में बाकायदा उनकी गिनती की जाती है। अमेरिका की जनगणना में अश्वेत, हिस्पैनिक, नैटिव इंडियन और एशियन जैसे समूहों की गणना की जाती है। विकास कार्यक्रमों के लिए इन आंकड़ों का इस्तेमाल भी कियाजाता है। यूरोप के भी अनेक देशों में ऐसा होता है।
(6) एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि जनगणना तो अब शुरू हो गयी है, ऐसे में जाति की गणना इस बार संभव नहीं हो सकेगी। मीडिया के एक हिस्से में भी इस तरह की बातें कही गयीं। पर इस तरह के तर्क जनगणना संबंधी बुनियादी सूचना के अभाव में या लोगों के बीच भ्रम फैलाने के मकसद से दिये जा रहे हैं। जनगणना कार्यक्रम के मौजूदा दौर में अभी मकानों-भवनों आदि के बारे में सूचना एकत्र की जा रही है। आबादी के स्वरूप और संख्या आदि की गणना तो अगले साल यानी 2011 के पहले तिमाही में पूरी की जानी है। इसके लिए फरवरी-मार्च के बीच का समय तय किया गया है। ऐसे में जाति-गणना की तैयारी के लिए अभी पर्याप्त वक्त है।
(7) जनगणना में अनुसूचित जाति-जनजाति और धार्मिक समुदायों की गणना पहले से होती आ रही है। इस बार से अन्य सभी जातियों, समुदायों और धार्मिक समूहों की गणना हो। इससे जरूरी आंकड़े सामने आएंगे। इन सूचनाओं से समाज को बेहतर, संतुलित और समरस बनाने के प्रयासों को मदद मिलेगी।
(प्रो डी प्रेमपति, मस्तराम कपूर, राजकिशोर, उर्मिलेश, प्रो चमनलाल, नागेंदर शर्मा, जयशंकर गुप्ता, डा निशात कैसर, श्रीकांत और दिलीप मंडल द्वारा जारी आलेख)

7 टिप्‍पणियां:

  1. तो क्या सही है सुनील दत्त साहब?

    उत्तर देंहटाएं
  2. जातिवाद का जहर,समुन्द्र मंथन कर रहे हैं का,आप तो साक्षात् शिव हैं? मोहल्ला वाले का सच कौन नहीं जनता. सब फिजूल.

    उत्तर देंहटाएं
  3. शकील साहब हम जानते हैं कि ये हमारे डिबेट के अगेंस्ट है. पर बहस एकतरफा नहीं होनी चाहिए...कुछ लोग पक्ष में हैं कुछ लोग विपक्ष में.हर किसी को विचार प्रकट करने की छूट है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेनामी महोदय आप जो भी हैं इतना जान ले कि यहाँ समुन्द्र मंथन ही हो रहा है..आपको कोई आपत्ति है तो बताएं. मोहल्ला की क्या भूमिका है ब्लॉग में ये हम सब जानते हैं...सो अपनी कुंठा जाहिर न करें तो बेहतर.

    आपका ही
    सौरभ के.स्वतंत्र

    उत्तर देंहटाएं