सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

शुक्रवार, अगस्त 07, 2009

हाँ वह स्नातक है....तो ???

वह स्नातक है...वह डॉ राजेंद्र प्रसाद को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में निरूपित करता है...

वह स्नातक है...वह बताता है कि १५ अगस्त को हम गणतंत्र दिवस मनाते हैं...

वह स्नातक है...वह महात्मा गाँधी को राष्ट्रपति बताता है...

वह स्नातक है...उसे देख/सुन मैं आश्चर्य भी खाता हूँ...

वह स्नातक है...पर इसका दोष मै उस बेचारे को दूँ या सिस्टम को???

17 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसे जबाबों पर तो सिस्टम से ज्यादा उसी को दोष दो. ज्ञानार्जन की जिम्मेदारी तो सिस्टम की नहीं. हर बात सिस्टम पर थोप निश्चिंत हो जाना कहाँ की जिम्मेदारी है.

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  2. इस सिस्टम को चलने के लिए ऐसी साक्षरता की ही तो आवश्यकता है ..!!

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  3. समीर जी वो क्या करे उसे जब पढने का माहौल ही नहीं...मिला..उसे तो जिधर हांक दीजिये उधर ही चला जायेगा..

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  4. वाणी गीत जी तब तो हो जायेगा आने वाली पीढी का भी बेडा गर्क

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  5. थोडा परदेस से यहाँ के गाँव में आकर देख लो समीर भाई..सीन क्लीयर हो जायेगा...

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  6. kahana kya chahte hain...snatak agyani hote hain ?

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  7. हम भी इसी सिस्टम से हैं, हमें तो सब पता है, जो लोग पढ़ते नहां सिर्फ डिग्री बटोरते हैं उन्हें ही लानत भेजिये

    मनीषा

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  8. बेनामी महोदय आप इसे अन्यथा ले रहे हैं....लेकिन मैंने बहुतो बी.ए. पास को देखा/सुना है... और यह शाश्वत सत्य है

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  10. bahut achha laga
    kamaal ki nazar
    aur nazar ko noor me badal kar andhere par
    ujaale ki kiran maarne ke is hunar ka
    abhinandan !

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  11. manisha ji ye to wahi baat ho gayi "gaye the hari bhajan ko otan laga kapas.." jara dimag khol kar sochiye..satya hi sundar hai..

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  12. ऐसे लोगों को हमने नौकरी पाते भी देखा है......लेकिन ऐसे लोगों की गिनती नही के बराबर ही मानें...।भाइ भतीजावाद का ही नतीजा है यह..

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  13. भाई मेरे

    परदेश में रह जरुर रहा हूँ मगर पैदाईश से लेकर दिल तक भारतीय ही हूँ. अभी तो मात्र नौ बरस ही हुए हैं यहाँ आ बसे और उसमें से भी दो बरस तो भारत में बीते होंगे वो भी पूर्णकालिक घूमते और समझते.

    जब तक भारत में रहा. राजनैतिक और सामाजिक गतिविधियों में अति सक्रियता से जुड़ा रहा. अतः शहरी और ग्रमीण परिवेश की पूरी जानकारी रखता हूँ और अनुभव भी.

    एक तरफ आप कहते हैं कि वो स्नातक है. क्या बिना माहौल मिले और सुविधाओं के वह स्नातक हो गया?

    अगर आप कहते कि वो पढ़ा लिखा नहीं है, तो मैं फिर भी मान लेता कि सुविधायें न रही होंगी.

    यद्यपि इसी राजनिति में ऐसे स्नातक भी देखे हैं जिन्हें जो प्रश्न आपने रखें हैं, उनका वाकई ज्ञान नहीं. मगर क्या उसके लिए सिस्टम दोषी है या उस सिस्टम को बेजा और गलत इस्तेमाल करने वाले.

    वो ऐसे स्नातक हैं जिनके बाप दादे रसूकदार और मजबूत पकड़ के लोग थे और उनके बिना कालेज गये ही उन्हें उन रसूकों को चलते, पैसे की ताकत से सिस्टम में सेंध लगाकर स्नातक की उपाधि प्रप्प्त हो गई.

    कोई गरीब, मजबूर, गैर रसूकदार, सुविधा वंचित व्यक्ति, मुझे भारत के किसी भी शहर या गाँव में दिखा दें जो स्नातक बिना अपनी मेहनत के हो गया हो और उसे इन जैसे सामान्य प्रश्नों का भी ज्ञान न हो कि महात्मा गाँधी राष्ट्रपिता थे या राष्ट्रपति.

    नौकरी मिलना या न मिलना, हाँ यहाँ सिस्टम दोषी हो सकता है मगर उसकी अज्ञानता, वो भी स्नातक हो जाने पर, यह मात्र उस व्यक्ति का दोष है न कि सिस्टम का.

    मेरे परदेश में रहने से मेरे गाँव की मेरी जड़े और जानकारी कमजोर नहीं हुई है बल्कि सुदृढ ही हुई हैं. शाय्द भीतर से वो तस्वीर नहीं देख पाता था जो बाहर आकर पूरी हो गई है.

    विचार किजिये, शुभकामनाऐं.

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  14. dosh sirf uska hai..isse mai sahmat nahi hoon sameer bhai...dosh mahaul ka bhi hai..aur mahaul banane wala sistam hi hai..sochiye..vichariye..

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  15. चलिये, आपको ऐसा लग रहा है तो कोई विशेष वजह एवं अनुभव ही होगा.

    मैं बात को यहीं विराम देता हूँ.

    आपको बहुत शुभकामनाऐं.

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