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शुक्रवार, अगस्त 07, 2009

बिहार की पीड़ा कम कैसे होगी...यहाँ यूपीए की सरकार जो नहीं

हवा में डोलता आश्वासनों का झूला

बिहार की पीड़ा कम कैसे हो? आम लोग अपने पीड़ा को अपने तई जब्त करने को मजबूर हैं। आश्वासन उन्हें मिलते हैं। सपने जिंदा होते हैं। पर, सपनों का कत्ल भी हो जाता है। आश्वासनों का झूला सिर्फ हवा में हीं डोल कर रह जाता है। सिर्फ राज्य सरकार करे भी तो क्या करे? खजाना खाली है। केंद्र को भेजे गए कई प्रस्ताव लंबित हैं। विशेष राज्य की मांग जारी है.....पर यहाँ यूपीए की सरकार नहीं ..

बिहार राज्य है। पिछड़ा राज्य। पर किस दर्जे का राज्य? सवाल सौ टके का है। आइये ढूंढते हैं जवाब। कभी प्राकृतिक संपदा का खान था बिहार। झरिया से लेकर झांझा तक सिर्फ हीरे हीं हीरे। पर, विडम्बना देखिये उस समय यहां जंगल राज हुआ करता था। कुशासन। चारों तरफ लूट-मार। उन संपदाओं की सुध लेने वाला कोई नहीं। नवम्बर, 2000 में बिहार बंट गया। सारी की सारी प्राकृतिक संपदा झारखंड में चली गयीं। बिहार को मिला बस पिछड़ापन, गरीबी। गरीबी भी एपीएल और बीपीएल वाली। उसमें में भी धांधली। सो, उस समय भी बिहार को दर्जा देने की मांग की गई थी। विशेष राज्य वाला दर्जा। तकरीबन दो सौ हजार करोड़ की मांग की थी राज्य सरकार ने। पर उस समय मजबूत नेता निर्णायक सरकार यहां नहीं थी। जो केंद्र के छाती पर चढ़ अपनी बात रख सके। और न हीं उस समय नेताओं में वह इच्छा शक्ति थी।

इस बार इच्छाशक्ति भी है और वैसी सरकार भी। लिहाजा, मांग उठ रही है। बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की। पर वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियां साथ नहीं दे रही हैं, इस राज्य का। यहां की सरकार का। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार चिंता में हैं। कैसे बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाया जाय। ताकि यहां का सामाजिक और आर्थिक पिछड़ापन दूर हो सके। लोगों को रोजगार मिल सके। महागरीबी से छुटकारा मिल सके।

आंकड़े हैं आंकड़ों का क्या? शायद केंद्र सरकार यहीं सोच रही है। तभी तो यहां के एक करोड़ बाइस लाख बीपीएल परिवार को वह महज 65 लाख हीं समझ रही है। सो, यह गरीब प्रदेश बाकि के बीपीएल परिवारों का बोझ खुद सह रही है। दरअसल, सच तो यह है कि यहां यूपीए की सरकार नहीं है। उसका जनाधार नहीं है। सो, केंद्र सरकार ने भी छोड़ दिया है बिहार को उसकी नियति पर। पर यहां जो आंकड़ें पेश किये जा रहे हैं वह सच हैं। उसकी बुनियाद में रत्ती भर भी लाग-लपेट नहीं है। आर्थिक पुराधाओं की माने तो बिहार गरीबों का अमीर राज्य है। इस क्षेत्र में यह नम्बर एक पर आता है। बिहार विकास के लिए धन खर्च करने वाले राज्यों की सूची में सबसे नीचले पायदान पर आता है। प्रति व्यक्ति आय इस राज्य में सबसे कम है। वहीं यह भी जगजाहिर है कि बिहार के पास प्राकृतिक संपदाओं का अभाव है। संसाधनों का भी। सो, बड़ी कंपनीयां यहां निवेश करने से कतराती हैं। लिहाजा, बेरोजगारों की टोली मजबूरन पलायन कर जाती है, इस राज्य से। नक्सलवाद यहां की गंभीर समस्या है। इससे लड़ने के लिए बिहार के पास पर्याप्त संसाधन नहीं है। धन नहीं है। वहीं बाढ़ की समस्या, चाहे कोसी हो या गंडक का प्रलय, यहां की गंभीरतम त्रासदी है। एकबारगी सैकड़ों-सैकड़ों गांव को कोसी लील लेती है। बिजली की समस्या, कम प्रति व्यक्ति खर्च, खस्ताहाल सड़क, कर के कम स्त्रोत, बंद पड़े चीनी मील, सींचाई के लिए संसाधनों का अभाव यहां के सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार हैं।

सवाल यह उठता है कि सांसों ने भी जिंदा होने का कभी सबूत मांगा है क्या? कहीं न कहीं ये समस्याएं, ये आंकड़े बिहार को अन्य राज्यों से अलग करती हैं। पर इस पर केंद्र को कौन राजी करे? केंद्र को कौन दिखाये की बिहार हर मामले में पिछड़ा है। उसे कौन बताये कि इसे विशेष राज्य का दर्जा देने की जरूरत है। इस बार केंद्र सरकार में बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई उम्दा नेता भी नहीं है। एक हैं तो वह भी अपने पिता की बस विरासत हीं संभाल रही हैं। पिछली बार प्रतिनिधित्व करने वाले थें तो वे अपने राग अलापने में मशगूल थें। घर में खाने को कुछ नहीं और नखरे हजार वाली बात थी। सूबे की चिंता तो जैसे नीतीश कुमार के कंधे पर लाद दिये गये थें।

फिलहाल, दस जनपथ और सात रेसकोर्स पर कांग्रेसी झंडा बुलंद है। यानी राजनीतिक परिस्थितियां बिहार से इतर। एकदम उलट। लिहाजा, केंद्र सरकार ऐसी जहमत उठाने से रही। दरअसल, केंद्र सरकार के पास अन्य राज्य भी विशेष दर्जे की मांग के लिए लाइन लगाए खड़े हैं । उन राज्यों में उनकी हीं सरकार है। सो, केंद्र सरकार पहले उन राज्यों को इस मामले में तरजीह देगी।

पर यहां की पीड़ा कम कैसे हो? आम लोग अपने पीड़ा को अपने तई जब्त करने को मजबूर हैं। आश्वासन उन्हें मिलते हैं। सपने जिंदा होते हैं। पर, सपनों का कत्ल भी हो जाता है। आश्वासनों का झूला सिर्फ हवा में हीं डोल कर रह जाता है। सिर्फ राज्य सरकार करे भी तो क्या करे? खजाना खाली है। केंद्र को भेजे गए कई प्रस्ताव लंबित हैं। चाहे अक्तूबर,2008 में आये कोसी जल प्रलय के पुनर्वास के लिए 14 हजार करोड़ रूपये के पैकेज का प्रस्ताव हो या गन्ना से सीधे एथनॉल तैयार करने की अनुमति लेने की बात। या फिर विद्युत उत्पादन के लिए कोल लिंकेज लेने का प्रस्ताव हो। या फिर राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण की तरफ ध्यान आकर्षण की बात हो। केंद्र सरकार बिहार को हलके में ले रही है। महज आश्वासन। सिर्फ आश्वासन। आखिर कब तक सहेगा बिहार यह सौतेलापन।

-सौरभ के.स्वतंत्र

1 टिप्पणी:

  1. jarurat hai ek aisi sarkaar ki jo bihar me hokar bihar ki soche ,,,delhi ki nahi .. tab kahi jaakar bihar ek behatreen raajay banega .. aur kuch changes wahan ki janta ki thought process me bhi hona chahiye ... itne acche lekh ke liye main badhai deta hoon ...

    vijay

    pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

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