सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

बुधवार, अगस्त 05, 2009

भाई के लिए...

यह कविता सीमा स्वधा की पहली प्रकाशित रचना है जो कि संभवा पत्रिका के जनवरी-मार्च १९९५ के अंक में प्रकाशित हुई थी। पेश है रक्षाबंधन के मौके पर भाई के लिए लिखी गई यह कविता :


अमित मेरे भाई !
तुम कब हो गये इतने बड़े
अभी कल ही की बात है
खेलते थे तुम मेरी गोद में
और मैंने सिखाया था तुम्हें
वर्णमाला के प्रथम अक्षर
तुम्हारे मासूम, अनगढ़ चेहरे पर
लिखा था प्यार
बहुत दिनों बाद देखा आज तुम्हें
करते हुए बहस
सांप्रदायिकता, राजनीति, दर्शन....
औरतों के अधिकार और अस्मिता पर
और मैं हैरान सी देखती रही
मेरी गोद से उतर कर
कब जा बैठे तुम पिता की जगह
देते हुए हिदायत
क्या अच्छा क्या बुरा
मेरे लिए
-एक स्त्री के लिए
और मेरे भीतर की
असुरक्षित बच्ची का वजूद
स्वीकारता चला गया वह सब कुछ
यंत्रचालित
और निर्विरोध!

3 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी रचना!! बधाई!


    रक्षा बंधन के पावन पर्व की शुभकामनाऐं.

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  2. सुंदर भावपूर्ण रचना!

    रक्षाबंधन पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
    विश्व-भ्रातृत्व विजयी हो!

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