सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

मंगलवार, जुलाई 28, 2009

अजन्मा

ना जाने
कितने छंद/कितने तुक
और कितने लय से सजी
कवितायें उपजी
मन में
और खो गईं
छटपटा कर
अपने वजूद की तलाश में।
दरअसल
जो भी/ जितना भी
और जैसे भी
सोचते हैं हम
नहीं हो पाती सारी कविता
पर होती तो हैं
हमारे एहसास का
जीवंत हिस्सा
या कविता का उत्स
यूं कहें
अजन्मी कविता
अक्सर तन्हाई में
किन्हीं उदास पलों में
अचानक
कौंधता है
कोई मुखड़ा/ कोई बंद
और मैं शिद्दत से
महसूसती हूँ , डूब जाती हूँ
उन अजन्मी
कविताओं के दर्द में।

- सीमा स्वधा

4 टिप्‍पणियां:

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  2. अजन्मी कविताओं के दर्द में ही कविता निहित है ,जरुरत उस कविता के शब्दों को टटोलने ,उन्हें सहलाने,उन्हें चूमने और उनकी नमी को महसूस करने की है |चुप्पी की भी अपनी कविता होती है ,है न ?

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  3. awesh ji kavita ka koi n koi ras to to jindagi ke har pal me nihit hai..

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  4. BAHUT KHUB AAPANE KAHI EHASAS KA JIWANT HONA HI TO KAWITA HAI ......AAPANE JO KUCHH BHI LIKHA HAI BILKUL SACH HAI

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