सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

गुरुवार, जुलाई 12, 2012

बेबसी


सोचता हूँ
आसमान की तरह
खामोश रहू,
चुप-चाप बस जमी को निहारू
और तारीफ़ में तारो को
टिम-टिमा दू
बेबसी यही है कि
मै अथाह तो हूँ,
मै करीब तो दिखता हूँ,
पर हूँ दूर,
गोया
जुरर्त ये करता हूँ
कि एक मुट्ठी चांदनी में
जरुर भेजता हूँ सन्देशा,
जताना चाहता हूँ
मै ही हूँ
आसमान,
तारो वाला आसमान.


- सौरभ के.स्वतंत्र

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5 टिप्‍पणियां:

  1. चुप-चाप बस जमी को निहारू
    और तारीफ़ में तारो को
    टिम-टिमा दू
    .....वाह बहुत खूब....

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