सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

शुक्रवार, जून 04, 2010

कंडोम और पिल पर बहस से महिला सशक्तिकरण करने का प्रयास

पुराश्री, अनुश्री, तनुश्री,गीताश्री, इतिश्री.......में मैंने गीताश्री को ही क्यों चुना? क्योंकि वो बतियाती हैं महिला सशक्तिकरण की बात.कंडोम और पिल पर जिरह करके सुश्री गीताश्री करना चाहती हैं महिलाओं का उद्धार... उनका मानना है "पिल को स्त्री की आजादी से जोड़कर देखना मर्दवादी सत्ता की साजिश है..!" गीताश्री के ब्लॉग नुक्कड़ पर "पहले मुक्ति, अब गुलामी की गोली" पढ़ कर मै अभी याद कर रहा था उस औरत का चेहरा जो गाँव में रहती है और अपने पूत को दो जून की रोटी देने के लिए झाड़ू-पोछा लगाती है..जीने का संघर्ष करती है...पिल और कंडोम पर नजर डालने की उसे फुर्सत कहाँ? 25 की उम्र में ही वह 52 की दिखती नजर आती है...अनेकानेक समस्याओं से जूझती नजर आती है... अब सवाल यह है कि क्या वाकई पिल और कंडोम पर बहस से महिला सशक्तिकरण हो जावेगा..या यह प्रभाव है सेक्स पर सर्वे कराने वाली पत्रिका का..आप ही पढ़ लीजिये गीता जी की बहस को उन्ही के ब्लॉग नुक्कड़ से..लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की छूट है..


पहले मुक्ति, अब गुलामी की गोली

- गीताश्री

पिल का खेल सबको समझ में आ गया है। इनका बहुत बड़ा बाजार है। इसने औरतों को टारगेट किया। पुरुषो ने अपने स्पर्श के आनंद के लिए औरतो को गोली ठुंसाई। वे कंडोम को अपनी राह का रोड़ा मानते हैं। इसीलिए औरतो को मानसिक रूप से तैयार करते हैं कि वे पिल को अपना लें। औरतें ही गोली क्यो खाएं? इससे बेहतर है कि हम पचास साल की गुलामी से बाहर आएं।
-एक स्त्रीवादी लेखिका
बहुत योजनाबद्घ तरीके से पुरुष नियंत्रित कंपनियों और समाज ने पिल को प्रोत्साहित किया। जबकि हमारे पास उसका विकल्प कंडोम के रूप में मौजूद था। अब महिलाएं कंडोम के पक्ष में हैं।
-- एक स्त्रीवादी उपभोक्ता
एक शांत-सा विज्ञापन- टेलीविजन पर आता है इन दिनों। कोई शोर शराबा नहीं, पति पत्नी के बीच आंखों-आंखों में बातें होती है और उसके बाद ‘आई-पिल’ का जिक्र।ऐसा नहीं कि इससे पहले कोई गर्भ निरोधक दवाई बाजार में नहीं आई। सिप्ला कंपनी की यह गोली शायद कुछ ज्यादा ही खास है। इसे गर्भधारण के 72 घंटे बाद लेने से भी काम चल जाता है। यही इसकी सबसे खास बात है। कंपनी ने इस के प्रचार में गुलाबी रंगों से लिखा है, ‘इसका उपयोग बिना डॉक्टरी सहायता के भी किया जा सकता है। साथ ही यह भी लिखा है कि यह गोली गर्भपात की गोली नहीं है।’पचास साल पहले जब गर्भनिरोध· गोली अस्तित्व में आई तब औरतों की दुनिया बदलने का अंदाजा शायद किसी को न रहा होगा। अनचाहे गर्भ का बोझ ढोती और साल दर साल बच्चे पैदा करती औरतें असमय बूढ़ा जाती थीं। आधी जिंदगी रसोई और आधी कोख यानी बच्चे पैदा करने में गुजर जाती थी। अपने साथ दैहिक आजादी का अहसास लेकर आई ‘जादुई पिल’ ने जब पश्चिम की औरतों को पहली बार उनकी आजादी का अहसास कराया होगा, तब औरतों ने ईश्वर के बदले वैज्ञानिको को धन्यवाद दिया होगा। औरतों की इस बेचारगी के बारे में मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायर स्टोन ने भी स्पष्ट किया था कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। इन गोलियों ने पश्चिम में 50 वर्ष पहले महिलाओं के लिए मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ा दिए। आई पिल के पैकेट पर ऐसी औरतों का ही सूरते हाल छपा हुआ है। एक उदास औरत शून्य में देख रही है। उसके नीचे लिखा है, ‘असहजता, दुश्चिंता, क्रोध, खुद से खफा, भय, ग्लानि, क्षोभ, शर्म, अकेलापन... ऐसे अनेक तरह के संशय बोध से घिरी एक औरत अनचाही गर्भ का बोझ ढोने को खुद को तैयार नहीं पाती तो इससे उबार लेने के लिए ‘आई-पिल’ मदद करने आया।’ मदद के नाम पर स्त्रियां इनके जाल में फंसती चली गईं। जो चीज 50 साल पहले शुरुआती वर्षो में आजादी का प्रतीक थी, वह धीरे धीरे जबरन गुलामी का प्रतीक बन गई। अब पता चल रहा है कि जादुई पिल सेक्सुअल आजादी की सारी कीमत सिर्फ महिलाओं से वसूलता है, पुरुषों से नहीं। कोख से मुक्ति देने के नाम पर कंडोम की उपलब्धता के बावजूद स्त्रियां पिल की जादुई गिरफ्त में फंसती चली गईं। जबकि सच ये हैं कि पिल कंडोम की तरह यौन सुरक्षा नहीं दे सकता। बल्कि सिर्फ इस पर निर्भर रहे तो यौन संबंधी कई बीमारियां हो सकती है। कंपनियां भी इसे स्त्रियों की आजादी से जोड़कर प्रचारित करती हैं। इस दौर में पिल को स्त्री की आजादी से जोड़कर देखने को मैं मर्दवादी सत्ता की साजिश मानती हूं। ये ठीक है पिल ने मुक्ति दी थी। लेकिन 50 साल से स्त्रियां ही बचाव क्यो करें। आजादी के नाम पर उन्हें लुभाना बंद कर देना चाहिए। क्यों खाती रहें गोली। आप क्यो ना यह जिम्मेवारी उठाओ। अब मुक्ति दो गोली की गुलामी से। अपने लिए उपाय तलाशो और उन्हें आजमाओ। पिल के महत्व से हमें इनकार नहीं। दुनिया बदलने में उसका बहुत बड़ा हाथ रहा है। एक पुरानी फिल्म का संवाद यहां सटीक बैठता है, जिसमें लंपट नायक कुंवारी, गर्भवती-नायिका से कहता है, ‘ईश्वर ने तुम स्त्रियों को कोख देकर हम मर्दों का काम आसान कर दिया।’ लेकिन पिल ने आकर ईश्वर के काम में दखल दे दिया। ये गोलियां धार्मिक वर्जना के विरुद्ध एक औजार की तरह आईं जिसे स्त्रियों ने अपने बचाव के लिए इस्तेमाल किया। पचास साल पहले जब इन गोलियों का अस्तित्व सामने आया तब पश्चिमी विचार· मारग्रेट सेंगर ने टिप्पणी की थी, ‘गर्भ पर नियंत्रण वह पहला महत्वपूर्ण कदम है जो स्त्री को आजादी के लक्ष्य की ओर उठाना ही चाहिए। पुरुषों की बराबरी के लिए उसे यह पहला कदम लेना चाहिए। ये दोनों कदम दासता से मुक्ति की ओर हैं।’ मुक्ति का दौर आज भी जारी है। इस एक छोटी सी गोली ने औरतों की बड़ी दुनिया का नक्शा बदल दिया। औरतें खुदमुख्तार हुईं और देह पर उनका पहला नियंत्रण यही से आरंभ हुआ। उन्होंने तय किया कि उन्हें ‘महाआनंद’ की कीमत अनचाहे गर्भ से नहीं चुकाना है। बेखौफ औरतें पुरुषों के अराजक साम्राज्य से बाहर निकलीं। बस अब नई राह पर चलना है...आप समझ रही हैं ना॥।

24 टिप्‍पणियां:

  1. "पिल को स्त्री की आजादी से जोड़कर देखना मर्दवादी सत्ता की साजिश है..!"

    Galat baat geetashree

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  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. is desh main sabhi ko apni baat kahe ka haq aur adhikar hai,

    so kah diya

    http://sanjaykuamr.blogspot.com/

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  4. Aapne theek hi kaha. Yeh to hum sab ki jimnedaari hai.

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  5. Aapne theek hi kaha. Yeh to hum sab ki jimmedaari hai.

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  6. ..तो फिर दुधौ नहायिये और पुतौ फलिए .....अखंड गर्भवती भव !

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  7. Geetaji isse mahila sashaktikaran nahi kar rahi. koi jaruri nahi ki hum unke vichar se sahmat hai.

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  8. रजनीश जी उसी लिए तो बहस शुरू किया है..

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  9. और इस बहस से भी महिला सशक्तिकरण की ही चिंता की जा रही है..

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  10. अरविन्द जी यहाँ दूधो नहायो, पूतो फलो नहीं...उसके उलट बात हो रही है...

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  11. स्त्री-पुरुष के रिश्ते में दरार पैदा करने की गीताश्री की साजिश.

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  12. प्रिय सौरभ जी,
    गीता जी के इस बहस से महिला सशक्तिकरण का एक इंट भी इधर से उधर नहीं हो सकता. आपने ऐसे मुद्दे उठाये.कोटिश धन्यवाद.

    सदर/स्नेह
    रवि कुमार 'रंक'

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  13. क्या ब्लोग्वानी ऐसे ब्लोगों को रख कर खुश होता है या यह उसकी मजबूरी है
    देख लीजिये खुद ही ब्लोग्वानी को जहां मां बहन की हद दर्जे की अश्लील गालियाँ खुले आम दिखाई जाती हैं आगे पढ़ें और देखें

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  14. अनामिका जी,
    ठीक है आप सहमत हैं. पर पिल पर बहस से महिला सशक्तिकरण हो जायेगा? जवाब दीजिये.

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  15. बहस फिजूल होता तो लोग मुझे जरूर गाली देते..पर लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि गीता जी कौन है आपको मालूम है. और मै कहते फिर रहा हू..मुझे मालूम है..पर वैचारिक बहस में मै अगर उनके परिचय को आधार मानू तो लानत है मुझे अपने आप पर...आवाज़ निकली है तो दूर तलक जाएगी..

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  16. रवि जी..स्वागत है आपका इस बहस में..प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद

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  17. swatantra sahab,
    pil mahilaye hi kyo khaye?purush bhi to sawdhani barat sakte hain.

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  18. अनामिका जी कितनी महिलाये पिल का उपयोग करती हैं? १ करोड़-२ करोड़. यहाँ बात हो रही है आधी आबादी की. आपका जवाब इसी में मिल जायेगा..

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  19. हो सकता है मैं गलत होउं लेकिन मुझे लगता है कि देश का यही दुर्भाग्य है कि जिस मुद्दे पर चर्चा नहीं होनी चाहिये उसपर अकारण इतनी ज्यादा चर्चा कर दी जाती है कि वह अपने आप मुद्दा बन जाता है. अब पिल कंडोम की बात तो छोड़ दे क्या नारेबाजी और नेतागीरी से महिला सशक्त हो सकती है. मेरे ख्याल से नहीं. रही बात भारत में तो महिला पहले से सशक्त है. मैने अपनी दादी नानी मां और परिवेश में देखा है कि महिला सशक्त है. हां जो सशक्त नहीं है उसके लिये वह स्वयं और उसके माता पिता जिम्मेदार हैं. मेरा मानना है महिला सिर्फ और सिर्फ बेहतर शिक्षा से सशक्त हो सकती है. यदि महिला शिक्षित हो जायेगी तो वह अपने आप पिल और कंडोम को समझ जायेगी. रही बात कंडोम की तो मेरा दावा है कि 70 फीसदी महिलाएं स्वयं कंडोम का प्रयोग नहीं करना चाहती. यह महज बयानबाजी नहीं है यह सब मैने www.sexkya.com लिखने के दौरान समझा है. कहां इस बेकार की बहस में पड़े है. सबकी अपनी अपनी सोच है. इसलिये यदि महिला को सशक्त करना है तो उसे शिक्षित कीजिये.

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  20. अजीबो गरीब बहस है की है इस ब्लॉग वाले ने - मालूम नहीं ए कौन है ?? - गीता जी ने जो कुछ भी कहा - वो सच है - संजय गाँधी ने जब नसबंदी करवाना शुरू किया तो - पुरुष अपनी 'पत्नी' के पल्लू में छिपने लगे !

    खैर , यह ब्लॉग मोहल्ला पर प्रकाशित हुआ है और विशेष मै क्या कहूँ ? मोहल्ला एक खास लोगों पर अपने हमले के लिए 'फेमस' रहा है - और इस मोहल्ले को 'एक न्यूज चैनल' के खास पत्रकार का सप्पोर्ट है वो भी सबको पता है !

    मोहल्ला ने वी एन राय पर भी लगातार हमला किया है - फिर क्या हुआ सबको पता है !

    इस तरह की बातें शोभा नहीं देता ! कुंठित पत्रकारिता है ! हाँ , फेमस होना है तो 'सूरज' पर थूकना शुरू कर दीजिए - लोग जान भी जायेंगे और आप .. :)

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