सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

सोमवार, नवंबर 16, 2009

अर्थहीन

उम्र की दहलीज
चढ़ते चढ़ते
अचानक/समय ठहर सा गया है
चाँद लापता है
जाने कब से/और सूरज
सिर पर टंग गया है।
इस ठहरे हुये समय में
बदलते अवसरों के गवाह
उस आइने में
एक चालीस के करीब पहुँच रही
अर्थहीन हो चुकी औरत को
आजकल
चौदह साल की बच्ची दिखती है
जिन्दगी के प्रति जोश से लबालब
अन्जान राहों पर
बेखौफ बढती हुई अक्सर लगता है
प्यार और विश्वास के
सारे सन्दर्भ बदल से गये हैं
आहिस्ता आहिस्ता
कई कई रिश्ते
जो मायने रखते थे
तब भी/आज भी
बदले बदले से क्यों लगते हैं
जानती है औरत
पति की जरुरत है वो
और बच्चों के लिये अपरिहार्य
पर उसकी जरुरतों का
कोई कोना अनछुआ, वीरान भी
तमाम शोर और भागमभाग के बीच भी
अकेलेपन से जूझती औरत
थक जाती है
तमाम रिश्तो से घिरी
खुद से अन्जान औरत
जीती जा रही है
एक बेमतलब सी जिन्दगी
उसी चौदह साल की लड़की से
उधार मांग कर
कतरा कतरा जोश
बूंद बूंद प्यार।


- सीमा स्वधा

4 टिप्‍पणियां:

  1. तमाम रिश्तो से घिरी
    खुद से अन्जान औरत
    जीती जा रही है
    एक बेमतलब सी जिन्दगी
    उसी चौदह साल की लड़की से
    उधार मांग कर
    कतरा कतरा जोश
    बूंद बूंद प्यार।

    निशब्द कर देने वाली रचना .शुक्रिया इसको पढवाने के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  2. oh! ek aurat ke bhavon ko bahut hi gahrayi se pakda hai...........nishabd kar diya.

    उत्तर देंहटाएं
  3. उसी चौदह साल की लड़की से
    उधार मांग कर
    कतरा कतरा जोश
    बूंद बूंद प्यार।

    हां, बच्‍चे सि‍खाते हैं कि‍ बीमारी में भी कैसे खेले कूदें उसी उत्‍साह उमंग से।

    उत्तर देंहटाएं