सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

गुरुवार, अगस्त 06, 2009

संवाद

डूबते सूरज की
मद्धिम आभा से
पहरो चुपचाप हीं निहारते हुये
आस-पास
कोई संध्या अजनबी सा वजूद
डोलता है मेरे आस-पास
कहीं ये मैं तो नहीं
कभी/ उन बेहाया के फूलों के संग
गुपचुप मुस्कुराते हुये
कभी/मंदिर के कंगरे पर बैठे हुये
बहुत कुछ है
हमारे इर्द-गिर्द
सिव इन्सानों के जिनसे जोड़ा जा सकता है
संवाद सूत्र
खोला जा सकता है
मन की गिरह को बेहिचक
मसलन
की जा सकती है बाते
बारिस की बूंदों से बेझिझक
खेला जा सकता है
लुका-छिपी भी/
बादलों की ओट से
झाकते सूरज की चंद किरणों के साथ
जाया जा सकता है
कहीं भी/ सतरंगे
इंद्रधनुष पे सवार होकर।

- सीमा स्वधा

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