सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

गुरुवार, मई 20, 2010

हर तरफ धुआं है

हर तरफ धुआं है
हर तरफ कुहासा है
जो दांतों और दलदलों का दलाल है
वही देशभक्त है

अंधकार में सुरक्षित होने का नाम है-
तटस्थता। यहां
कायरता के चेहरे पर
सबसे ज्यादा रक्त है।
जिसके पास थाली है
हर भूखा आदमी
उसके लिए, सबसे भद्दी
गाली है

हर तरफ कुआं है
हर तरफ खाईं है
यहां, सिर्फ, वह आदमी, देश के करीब है
जो या तो मूर्ख है
या फिर गरीब है..


- सुदामा पाण्डेय धूमिल
(09 नवंबर 1936 - 10 फरवरी 1975)

3 टिप्‍पणियां:

  1. धूमिल जी की इस महान कविता के लिए धन्यवाद !

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  2. सिर्फ एक शब्द, बेहतरीन!

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