सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!

गुरुवार, मई 20, 2010

स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती

हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती
'अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ़- प्रतिज्ञ सोच लो,
प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!'

असंख्य कीर्ति-रश्मियाँ विकीर्ण दिव्य दाह-सी
सपूत मातृभूमि के- रुको न शूर साहसी!
अराति सैन्य सिंधु में, सुवाड़वाग्नि से जलो,
प्रवीर हो जयी बनो - बढ़े चलो, बढ़े चलो!

- जयशंकर प्रसाद की एक रचना

2 टिप्‍पणियां:

  1. आज भी मन गर्व से भर जाता है इन पंक्तियों को पढकर।

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  2. ye rachna jehan me amit chhap chhodti hai.ek bar phir yaad dilane ke liye swatantra sir ko sadhuvad.

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