सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!
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रविवार, अक्टूबर 23, 2011

बिहार में सी-कम्पनी का फिर खौफ!





  • बढ़ते अपराध को ले पुलिस के बजाये मीडिया पर बरसते नीतीश!

  • फिर पनप रहा है अपरहण उद्योग!


० सौरभ के.स्वतंत्र



सुशासन बाबू के नाम से विख्यात नीतीश कुमार के २००४ में सत्ता में आने के बाद बिहार को एक नयी उम्मीद की किरण दिखी. मसलन, अब बिहार से जंगल राज समाप्त हो रहा है..अपराध का ग्राफ गिर रहा है…वंचितों को न्याय मिल रहा है…इसी बेस पर सुशासन बाबू दूसरी पारी खेलने में सफल हुए..पर इन दिनों सूबे का आलम यह है कि सी-कम्पनी यानी कास्ट, क्राइम और करप्शन फिर सिर उठा रहा है..आये दिन हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं. मुख्यमंत्री सूबे के सारे एस.पी. और डी.आई.जी. की मैराथन बैठक कर रहे हैं..पर अपहरण, बलात्कार, हत्या के मामले थम नहीं रहे. मुख्यमंत्री पुलिस अधिकारियो की बैठक में किसी भी एस.पी. और डी.आई.जी को डांट पिलाने के बजाये मीडिया पर एकतरफा वार करते दिख रहे हैं. मुख्यमंत्री का मानना है कि मीडिया सिर्फ एकपक्षीय खबर दिखा रहा है..
इस लिहाज से यह कहना सर्वथा उचित होगा कि सरकार अवसरवादी हो गयी है. मेरी तो सरकार को यही राय है कि उसे यह मान लेना चाहिए कि नीतीश कुमार को जो लोकप्रियता व हाइप मिला है उसके पीछे मीडिया का ही हाथ है..अब जब सरकार नाकाम होती दिख रही तो भी मीडिया से ऐसी उम्मीद का भ्रम पाले रखना निहायत अलोकतांत्रिक है. सच तो सच है..पर्दा क्यों..?



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शुक्रवार, जून 04, 2010

कंडोम और पिल पर बहस से महिला सशक्तिकरण करने का प्रयास

पुराश्री, अनुश्री, तनुश्री,गीताश्री, इतिश्री.......में मैंने गीताश्री को ही क्यों चुना? क्योंकि वो बतियाती हैं महिला सशक्तिकरण की बात.कंडोम और पिल पर जिरह करके सुश्री गीताश्री करना चाहती हैं महिलाओं का उद्धार... उनका मानना है "पिल को स्त्री की आजादी से जोड़कर देखना मर्दवादी सत्ता की साजिश है..!" गीताश्री के ब्लॉग नुक्कड़ पर "पहले मुक्ति, अब गुलामी की गोली" पढ़ कर मै अभी याद कर रहा था उस औरत का चेहरा जो गाँव में रहती है और अपने पूत को दो जून की रोटी देने के लिए झाड़ू-पोछा लगाती है..जीने का संघर्ष करती है...पिल और कंडोम पर नजर डालने की उसे फुर्सत कहाँ? 25 की उम्र में ही वह 52 की दिखती नजर आती है...अनेकानेक समस्याओं से जूझती नजर आती है... अब सवाल यह है कि क्या वाकई पिल और कंडोम पर बहस से महिला सशक्तिकरण हो जावेगा..या यह प्रभाव है सेक्स पर सर्वे कराने वाली पत्रिका का..आप ही पढ़ लीजिये गीता जी की बहस को उन्ही के ब्लॉग नुक्कड़ से..लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की छूट है..


पहले मुक्ति, अब गुलामी की गोली

- गीताश्री

पिल का खेल सबको समझ में आ गया है। इनका बहुत बड़ा बाजार है। इसने औरतों को टारगेट किया। पुरुषो ने अपने स्पर्श के आनंद के लिए औरतो को गोली ठुंसाई। वे कंडोम को अपनी राह का रोड़ा मानते हैं। इसीलिए औरतो को मानसिक रूप से तैयार करते हैं कि वे पिल को अपना लें। औरतें ही गोली क्यो खाएं? इससे बेहतर है कि हम पचास साल की गुलामी से बाहर आएं।
-एक स्त्रीवादी लेखिका
बहुत योजनाबद्घ तरीके से पुरुष नियंत्रित कंपनियों और समाज ने पिल को प्रोत्साहित किया। जबकि हमारे पास उसका विकल्प कंडोम के रूप में मौजूद था। अब महिलाएं कंडोम के पक्ष में हैं।
-- एक स्त्रीवादी उपभोक्ता
एक शांत-सा विज्ञापन- टेलीविजन पर आता है इन दिनों। कोई शोर शराबा नहीं, पति पत्नी के बीच आंखों-आंखों में बातें होती है और उसके बाद ‘आई-पिल’ का जिक्र।ऐसा नहीं कि इससे पहले कोई गर्भ निरोधक दवाई बाजार में नहीं आई। सिप्ला कंपनी की यह गोली शायद कुछ ज्यादा ही खास है। इसे गर्भधारण के 72 घंटे बाद लेने से भी काम चल जाता है। यही इसकी सबसे खास बात है। कंपनी ने इस के प्रचार में गुलाबी रंगों से लिखा है, ‘इसका उपयोग बिना डॉक्टरी सहायता के भी किया जा सकता है। साथ ही यह भी लिखा है कि यह गोली गर्भपात की गोली नहीं है।’पचास साल पहले जब गर्भनिरोध· गोली अस्तित्व में आई तब औरतों की दुनिया बदलने का अंदाजा शायद किसी को न रहा होगा। अनचाहे गर्भ का बोझ ढोती और साल दर साल बच्चे पैदा करती औरतें असमय बूढ़ा जाती थीं। आधी जिंदगी रसोई और आधी कोख यानी बच्चे पैदा करने में गुजर जाती थी। अपने साथ दैहिक आजादी का अहसास लेकर आई ‘जादुई पिल’ ने जब पश्चिम की औरतों को पहली बार उनकी आजादी का अहसास कराया होगा, तब औरतों ने ईश्वर के बदले वैज्ञानिको को धन्यवाद दिया होगा। औरतों की इस बेचारगी के बारे में मार्क्सवादी विचारक शुलामिथ फायर स्टोन ने भी स्पष्ट किया था कि जब तक स्त्री को गर्भाशय से मुक्ति नहीं मिलती, तब तक उसकी वास्तविक मुक्ति संभव नहीं। इन गोलियों ने पश्चिम में 50 वर्ष पहले महिलाओं के लिए मुक्ति की दिशा में कदम बढ़ा दिए। आई पिल के पैकेट पर ऐसी औरतों का ही सूरते हाल छपा हुआ है। एक उदास औरत शून्य में देख रही है। उसके नीचे लिखा है, ‘असहजता, दुश्चिंता, क्रोध, खुद से खफा, भय, ग्लानि, क्षोभ, शर्म, अकेलापन... ऐसे अनेक तरह के संशय बोध से घिरी एक औरत अनचाही गर्भ का बोझ ढोने को खुद को तैयार नहीं पाती तो इससे उबार लेने के लिए ‘आई-पिल’ मदद करने आया।’ मदद के नाम पर स्त्रियां इनके जाल में फंसती चली गईं। जो चीज 50 साल पहले शुरुआती वर्षो में आजादी का प्रतीक थी, वह धीरे धीरे जबरन गुलामी का प्रतीक बन गई। अब पता चल रहा है कि जादुई पिल सेक्सुअल आजादी की सारी कीमत सिर्फ महिलाओं से वसूलता है, पुरुषों से नहीं। कोख से मुक्ति देने के नाम पर कंडोम की उपलब्धता के बावजूद स्त्रियां पिल की जादुई गिरफ्त में फंसती चली गईं। जबकि सच ये हैं कि पिल कंडोम की तरह यौन सुरक्षा नहीं दे सकता। बल्कि सिर्फ इस पर निर्भर रहे तो यौन संबंधी कई बीमारियां हो सकती है। कंपनियां भी इसे स्त्रियों की आजादी से जोड़कर प्रचारित करती हैं। इस दौर में पिल को स्त्री की आजादी से जोड़कर देखने को मैं मर्दवादी सत्ता की साजिश मानती हूं। ये ठीक है पिल ने मुक्ति दी थी। लेकिन 50 साल से स्त्रियां ही बचाव क्यो करें। आजादी के नाम पर उन्हें लुभाना बंद कर देना चाहिए। क्यों खाती रहें गोली। आप क्यो ना यह जिम्मेवारी उठाओ। अब मुक्ति दो गोली की गुलामी से। अपने लिए उपाय तलाशो और उन्हें आजमाओ। पिल के महत्व से हमें इनकार नहीं। दुनिया बदलने में उसका बहुत बड़ा हाथ रहा है। एक पुरानी फिल्म का संवाद यहां सटीक बैठता है, जिसमें लंपट नायक कुंवारी, गर्भवती-नायिका से कहता है, ‘ईश्वर ने तुम स्त्रियों को कोख देकर हम मर्दों का काम आसान कर दिया।’ लेकिन पिल ने आकर ईश्वर के काम में दखल दे दिया। ये गोलियां धार्मिक वर्जना के विरुद्ध एक औजार की तरह आईं जिसे स्त्रियों ने अपने बचाव के लिए इस्तेमाल किया। पचास साल पहले जब इन गोलियों का अस्तित्व सामने आया तब पश्चिमी विचार· मारग्रेट सेंगर ने टिप्पणी की थी, ‘गर्भ पर नियंत्रण वह पहला महत्वपूर्ण कदम है जो स्त्री को आजादी के लक्ष्य की ओर उठाना ही चाहिए। पुरुषों की बराबरी के लिए उसे यह पहला कदम लेना चाहिए। ये दोनों कदम दासता से मुक्ति की ओर हैं।’ मुक्ति का दौर आज भी जारी है। इस एक छोटी सी गोली ने औरतों की बड़ी दुनिया का नक्शा बदल दिया। औरतें खुदमुख्तार हुईं और देह पर उनका पहला नियंत्रण यही से आरंभ हुआ। उन्होंने तय किया कि उन्हें ‘महाआनंद’ की कीमत अनचाहे गर्भ से नहीं चुकाना है। बेखौफ औरतें पुरुषों के अराजक साम्राज्य से बाहर निकलीं। बस अब नई राह पर चलना है...आप समझ रही हैं ना॥।

गुरुवार, जून 03, 2010

विश्व पर्यावरण दिवस का आगमन और मेरा एक अंत्येष्टि में शामिल होना!

विगत महीने संजय उपाध्याय एक ऐसी अंत्येष्टि में शामिल हुए थे जो वाकई में दिल दहलाने वाला था..उन्ही के शब्दों में जान लीजिये...और जोड़ लीजिये आने वाले पर्यावरण दिवस से...

मैं 12 मार्च को एक ऐसी अन्त्येष्टि में शामिल होने गया था, जिसमें शामिल होने का अवसर हर आम को नहीं होता है। देखे तो आंख भर आए। यह कैसी अन्त्येष्टि है कि अन्त्येष्टि स्थल के पास ही लाश के हर हिस्से को फाड़कर रख दिया। बहुत सताया अब क्या सता पाएगी लाश है फाड़ डालो नौकरी का सवाल है और सरकार को जवाब भी देना है। ऐसी भी अन्त्येष्टि होती आप लोगों को जरा आश्चर्यजनक लग रहा होगा। परंतु, सच मानिए यह भी एक शव यात्रा ही है अंतर बस इतना है कि यह आदमी की शव यात्रा नहीं है वरन देश की सरकार के लिए चिंता का कारण बने जंगल की शान बाघ की रानी बाघिन की शव यात्रा है। स्थल है बिहार का वाल्मीकि टाइगर रिजर्व। दरअसल इस परियोजना के मदनपुर वनक्षेत्र से रायल बंगाल टाइग्रेस (बाघिन) की लाश 11 मार्च को एक गड्ढे में मिली। लाश क्या मिली विभाग का सारा अमला परेशान हो गया। आनन-फानन में राजधानी पटना से अधिकारियों की टीम चली। मदनपुर पहुंची और फिर 12 मार्च को चिकित्सक ने बाघिन की लाश को फाड़कर देखा कि कैसे मर गई? तत्काल कुछ भी पता नही चला। इतनी जानकारी हो गई कि बाघिन सात दिन पहले मरी होगी। फिर बेसरा सुरक्षित कर दिया गया और बाघिन की लाश को चैन मिला। फिर लाश को आग के हवाले कर दिया गया। मैने अधिकारियों से थोड़ी सी जानकारी मांगी तो बस वे लपक गए और गिना दी मजबूरी। उनकी भी बात जायज थी 840 वर्ग किलोमीटर में फैली इस परियोजना में अब से एक दशक पहले करीब पांच दर्जन बाघ थे, लेकिन अब इनकी संख्या 10 से तेरह के बीच थी। इनमें से भी एक घट गई। लोग बताते हैं इण्डो-नेपाल व उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित इस व्याघ्र परियोजना में जमकर शिकार होता है। परंतु, निहत्थे वनकर्मी क्या करें? न वाहन न वेतन और नहीं सुरक्षा तो बस ये लोग भी लाश गिनने और अंत्येष्टि में लगे रहते हैं और सरकार को रिपोर्ट भी देते हैं। यदि अब भी सरकार की आंख नहीं खुली तो एक दिन ऐसा आएगा कि बाघ, जंगल सब कुछ सरकार के लिए सपना हो जाएंगे। यहां बता देता हूं संख्या देश की कुल 38 परियोजनाओं में पिछले रिकार्ड के मुताबिक 1411 बाघ थे अबकी बाघिन की मौत के बाद यह संख्या 1409 होगी। कारण इससे पहले भी इसी परियोजना में 2008 में एक और रायल टाइगर तड़प-तड़प कर मर गया था। ऐसे में सरकार को अब देखना चाहिए आखिर कबतक यूं ही मरेंगे बाघ।
संजय उपाध्याय का ब्लॉग है

बुधवार, जून 02, 2010

पत्रकार का दुधारू होना!

ब्लॉग पर यह मेरा पहला लेख था। जोकि 11 अप्रैल'2008को रिजेक्ट माल ब्लॉग पर प्रणव प्रियदर्शी जी के मार्गदर्शन में पोस्ट किया गया था. आज विचर रहा था उसी ब्लॉग पर. सोचा पुरानी यादें ताज़ा कर ली जाये...गौर फरमाइए....

पत्रकार का दुधारू होना!


दुधारू पशुओं की फेहरिस्त काफी लम्बी है. चूंकि, मनुष्य भी पशु (सामाजिक) है. सो, उसका भी दुधारू होना लाजिमी है. हाँ, ये बात अलग है कि कोई उन्नत नस्ल का है और कोई बाँझ टाइप. चूंकि मैं एक पत्रकार हूँ. सो, पत्रकारों के दुधारू होने पर चर्चा करना मेरा कर्तव्य बनता है. पत्रकार शब्द जब भी सुनने को मिलता है तो मुझे वह दुधारू गाय नजर आने लगती है, जो खाती तो है अपने बछड़े को दूध पिलाने के लिए . पर उसे दुह कोई और लेता है. बेचारी वह चाहकर भी कुछ नही कर पाती सिवाय हाथ-पांव पटकने के.

आजकल पत्रकार बंधुओ को भी गजब दुहा जा रहा है. एकदम रेलवे के माफिक. शायद यह सोंचकर कि उन्हें कम दुहेंगे तो अख़बार या चैनल बीमार पड़ सकते हैं. पत्रकारों के दुहने की बात थोड़ा विस्मय पैदा करती है. पर आजकल पत्रकार पैदा करने वाले इतने सारे केन्द्र खुल गए हैं. जहाँ से हजारो-हज़ार की संख्या में किसिम-किसिम के पत्रकार निकल रहे हैं. लिहाजा, स्थिति यह हो गई है कि हर चैनल और अख़बार के पास अनेकानेक विकल्प हो गए हैं. अगर, आप सही तरीके से दूध नही देते हैं तो समझिए आपकी छुट्टी तय है. मतलब आपको इस लाइन में जगह बनानी है तो अपने आप को खूब दुहवाइये . चाहे आप कितने भी बड़े ओहदे पर क्यो न पहुँच जाए आपके ऊपर भी कोई आपको दुहने वाला है.
एक माह पहले इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के ऑडिटोरियम मे बैठा था. जहाँ पत्रकारिता की शिक्षा के मानकीकरण पर चर्चा हो रही थी. जिसमे अच्युतानंदजी, आनंद प्रधानजी, राहुल देवजी, आलोक मेहताजी जैसे वरिष्ठ हस्ताक्षर पत्रकारिता के भविष्य को लेकर अपनी चिंता व्यक्त कर रहे थे. आलोक मेहता जी ने कहा कि इस दौर में संपादक के सत्ता का क्षरण हो रहा है. मैं काफी सोंच मे पड़ गया कि जब पत्रकारिता के शीर्ष पर बैठे लोग ऐसी बात करते हैं तो हमारी क्या बिसात.... हो सकता है संपादक भी अपने आप को दुहा हुआ महसूस करता हो.

हंस पत्रिका के एक मीडिया विशेषांक मे मैंने पढ़ा था कि संपादक को भी अपने ग्रुप चेयरमैन की बातें सुननी पड़ती हैं. उनके सवालो का जवाब देना पड़ता है. जैसे टीआरपी को... खबरों के एंगल को ले कर जवाबदेही ... ख़बर छूट जाने पर भी जवाब देना पड़ता है. वगैरह..वगैरह..

लिहाजा संपादक भी दुहा जाते हैं. और दबाव मे आकर अपने अंडर में काम करने वालो को उन्हें दुहना पड़ता है. अपने बॉस के मार्गदर्शन पर न चाहते हुए भी उन्हें चलना पड़ता है. और जूनियरों को दुहना पड़ता है. वही जूनियर न्यू कमर्स की दुहाई गुस्से मे आकर करते हैं..थोड़ा भी चूं..चा किया कि छुट्टी तय. सो, अपने आपको दुह्वाना ही अपनी नियति मन लेना श्रेयस्कर है.

लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो, उस घोडे से पूछो जिसके मुंह में लगाम है। यह मैं नही कह रहा हूँ. बल्कि धूमिल ने कहा है. अब जब लगाम की बात आती है तो स्वतंत्र पत्रकार भाई लोग के मुह मे लगाम तो नही है. पर अगर शब्दों के बीच गिरे खून को पहचाने तो जाहिर हो जाएगा कि स्वतंत्र पत्रकार भी दुधारू जमात मे उन्नत नस्ल से सम्बन्ध रखते हैं. दरअसल, उनके अन्दर छपास का रोग होता है. सो, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ में लेख दीजिये , नाम कमाइये , और भूखे सोयिये. यदि कही से सात-आठ माह में चेक आ भी जाए तो उसे लेखन सामग्री खरीदने मे लगा दीजिये , इंटरनेट व कंप्यूटर आदि के चार्ज भर दीजिये. और सूखी अंतडियों से निर्बाध लेख निकालिए. यदि नही निकालते हैं तो आप उन्नत किस्म के दुधारू पत्रकार नही हैं. पारिश्रमिक के लिए सम्पादकजी को फ़ोन घुमाइये तो एहसान फरामोशी का तमगा पाइए. मतलब स्वतंत्र पत्रकार का भी कमोबेश वही हालत है. पर अन्य पत्रकारों से थोड़ा इतर .

मैं जानता हूँ कि पत्रकारों को दुधारू पशु के रूप मे निरुपित करना कितने शूरमाओं को नागवार गुजरेगा...पर क्या करें..कलम है कि रूकती नही।

रिजेक्ट माल को आभार.

सोमवार, मई 31, 2010

मनोज बाजपेयी की पीड़ा

मनोज बाजपेयी...कला के धनी अभिनेता....उनका एक ब्लॉग है॥आज विचरते हुए पहुँच गया उनके ब्लॉग पर..कई पोस्ट पढ़े...पोस्ट का पोस्टमार्टम भी किया...उनके एक लेख ने मुझे काफी प्रभावित किया.....चर्चा का विषय था उनकी ही की फिल्म स्वामी और 1971(आप कही यह नाम सुनकर चौंक गए हो). मैंने ये दोनों फिल्मे देखी थी...सो सारा माजरा क्लियर हो गया..दरअसल, इतनी बेहतरीन फिल्म आम लोगो के पास नहीं पहुँच पाई..इसका दुःख मनोज को भी है और उनके पोस्ट को पढने के बाद मुझे भी...उनके इस लाइन ने तो हृदय को रुला दिया..

"मैं अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘1971’ को मानता हूं। इसी फिल्म को इस साल बेस्ट हिन्दी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है। लेकिन, इस फिल्म की खराब पब्लिसिटी का ही नतीजा था कि दर्शकों को इस फिल्म के बारे में पता नहीं चला। टेलीविजन पर लोग फिल्म देखकर अब फोन करते हैं और पूछते हैं कि ये कौन सी फिल्म है, जिसमें मैंने इतना बढ़िया अभिनय किया है। "

मेरा माननाहै किप्रचार तंत्र ने इस फिल्म की सफलता पर रंदा मार दिया...

पढ़िए मनोज का ही आलेख उन्ही के ब्लॉग से..
प्रचार बिन सब सून

अपनी नयी फिल्म ‘जेल’ के प्रमोशन के लिए मैं फैशन वीक में रैंप पर उतरा तो कई लोगों ने मुझसे एक सवाल किया कि क्या रैंप पर उतरना फिल्म कलाकारों के लिए अब फैशन हो गया है? या इस हथकंडे से फिल्म के सफल होने की गारंटी मिल जाती है? ये सवाल शायद इसलिए भी बार बार पूछा गया क्योंकि रैंप पर ‘जेल’ के सभी सदस्य यानी मैं, नील, मुग्धा और डायरेक्टर मधुर भंडारकर साथ-साथ उतरे और मैंने और नील ने तो कैदी की यूनिफॉर्म पहनी थी, और हाथ में हथकड़ी लगायी हुई थी। लेकिन, बात रैंप पर चलने की नहीं, इस बारे में पूछे गए सवालों की है।

फिल्म के प्रमोशन के लिए रैंप पर चलना इन दिनों आम हो गया है-इसमें कोई शक नहीं है। दरअसल, कंज्यूमरिज़्म के इस दौर में फिल्म भी एक प्रोडक्ट है और बॉलीवुड को यह बात अब अच्छी तरह समझ आ चुकी है। एक प्रोडक्ट को बेचने के लिए जिस तरह एडवरटाइजिंग की जरुरत होती है,उसी तरह फिल्म को बेचने के लिए भी एडवरटाइजिंग की जरुरत होती है। लेकिन, फिल्म और दूसरे प्रोड्क्ट में एक बड़ा अंतर यह है कि फिल्म का हश्र रिलीज के तीन दिनों के भीतर तय हो जाता है। ऐसे में, फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने के लिए जिन जिन तरीकों या कभी कभार हथकंडों की जरुरत होती है, उनका सहारा लिया जाता है। रैंप पर चलना सबसे सस्ते तरीकों में हैं,जहां आप कोई रकम खर्च नहीं कर रहे अलबत्ता पब्लिसिटी बटोर रहे हैं।
बहुत से लोग इस बारे में सवाल कर सकते हैं कि क्या पब्लिसिटी से फिल्म हिट हो सकती है? क्योंकि कई बड़े बजट की फिल्मों को धुआंधार पब्लिसिटी के बावजूद औंधे मुंह गिरते लोगों ने देखा है। जी हां, इसमें कोई दो राय नहीं है कि सिर्फ पब्लिसिटी ही सब कुछ नहीं होती। लेकिन,माफ कीजिए बहुत कुछ होती भी है। आखिर,दर्शकों को रिलीज हुई फिल्म के बारे में पता तो चलना चाहिए। उस फिल्म की कहानी-कलाकार आदि के बारे में कुछ तो पता होना चाहिए, तभी तो वो थिएटर तक फिल्म देखने की मशक्कत करेगा।
करियर के शुरुआती दौर में मैं पब्लिसिटी को अहम नहीं मानता था। लेकिन, अब मुझे लगता है कि मैं गलत था। दरअसल, अपनी फिल्मों की खराब पब्लिसिटी का हश्र मैंने कई बार भुगता है। मेरी फिल्म ‘स्वामी’ को आलोचकों ने बहुत सराहा, लेकिन फिल्म पिट गई क्योंकि दर्शकों को इसके बारे में पता ही नहीं चला कि फिल्म कब आई और कब गई। मैं अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्म ‘1971’ को मानता हूं। इसी फिल्म को इस साल बेस्ट हिन्दी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है। लेकिन, इस फिल्म की खराब पब्लिसिटी का ही नतीजा था कि दर्शकों को इस फिल्म के बारे में पता नहीं चला। टेलीविजन पर लोग फिल्म देखकर अब फोन करते हैं और पूछते हैं कि ये कौन सी फिल्म है, जिसमें मैंने इतना बढ़िया अभिनय किया है। हाल में प्रदर्शित हुई एसिड फैक्ट्री के बारे में भी मेरा यही मानना है कि फिल्म की पब्लिसिटी ठीक नहीं हुई।
आज के युग में फिल्मों के प्रचार प्रसार के लिए जरुरी है कि आप यानी कलाकार और फिल्म से जुड़े लोग हर संभव मंच से चिल्ला चिल्लाकर बताएं कि अमुक फिल्म रिलीज हो रही है। लोग कहते हैं कि क्या अब माउथ पब्लिसिटी के लिए कोई जगह नहीं है। तो मेरा यही मानना है कि नहीं है। वो इसलिए क्योंकि फिल्म का धंधा सिर्फ तीन दिनों का है,क्योंकि अगर तीन दिनों के भीतर लोग थिएटर तक नहीं पहुंचे तो फिर अगले हफ्ते तीन-चार फिल्में रिलीज के लिए तैयार होती हैं।
निश्चित तौर पर छोटे निर्माताओं को अपनी फिल्म के प्रचार में अब खासी मुश्किलें आती हैं, और उनके लिए यही रास्ता है कि वो सभी मुमकिन मंच से फिल्म का प्रचार करें। रिएलिटी शो में जाएं, रैंप पर कलाकारों को उतारें, वेबसाइट पर चैट करें वगैरह वगैरह। कुल मिलाकर सच्ची बात यही है कि बिन प्रचार सब सून है। दर्शकों द्वारा फिल्म पसंद या खारिज तो तब की जाएगा,जब बड़ी संख्या में लोग फिल्म को देखें और बिना पब्लिसिटी यह मुमकिन नहीं है। इसलिए ‘जेल’ या अपनी किसी दूसरी फिल्म के लिए जब मैं रैंप पर उतरता हूं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि मैं चाहता हूं कि लोग फिल्म को देखने के बाद अपना फैसला दें।
इसी के साथ
आपका और सिर्फ आपका
मनोज बाजपेयी
इस लेख को पढने के बाद स्वामी और 1971जरूर देखे..

शनिवार, मई 29, 2010

बिहार के पत्रकारों और सरकार को गरियाते एक संपादक

एक पत्रकार नागपुर में रहते हैं और एक बिहार में.. नागपुर में रहने वाले पत्रकार महोदय एस.एन.विनोद हैं वही बिहार में रहने वाले पत्रकार सुरेन्द्र किशोर जी हैं...एस.एन.विनोद की माने तो बिहार में कोई विकास या काम नहीं हो रहा (क्योंकि उनके किसी मित्र ने उन्हें फ़ोन पर बताया है)...वे इसी आधार पर बिहार के पत्रकारों पर आरोप लगा कर कहते हैं कि बिहार के पत्रकार बिके हुए है..जो पैसो के बल पर विकास का भ्रम मात्र पैदा कर रहे हैं...विनोद जी ने अपने ब्लॉग चीर फाड़ पर पत्रकारों को गरियाने के लिए लालू प्रसाद का हवाला भी दिया है.


वही हमेशा से मुख्यमंत्रियों की आलोचना करते रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर जी की माने तो बिहार में वाकई काम हो रहा है और उन्हें कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार के शासन आने की प्रतीक्षा क्यों करते.. ?


अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई नीतीश ने पत्रकारिता का उपयोग करके विकास का भ्रम पैदा कर रखा है या एस.एन.विनोद (नागपुर) और बिहार के बीच फासला और एक संपादक मित्र के फ़ोन कॉल ने नीतीश के सारे विकास कार्यो पर पर्दा दाल दिया है..


पहले पढ़ते हैं एस.एन.विनोद का आलेख उन्ही के ब्लॉग चीर फाड़ से...

नीतीश का बिहार, नीतीश के पत्रकार!
अब इस विडंबना पर हंसूं या रोऊं? एक समय था जब पत्रकार राजनेताओं अर्थात्ï पॉलिटिशियन्स को भ्रष्ट, चोर, दलाल निरूपित किया करते थे। वैसे करते तो आज भी हैं, किंतु अब राजनेता पत्रकारों को भ्रष्ट, चोर, दलाल, निरूपित करने लगे हैं। क्यों और कैसे पैदा हुई ऐसी स्थिति? तथ्य बतात हैं कि स्वयं पत्रकार ऐसे अवसर उपलब्ध करवा रहे हैं। इस संदर्भ में बिहार से कुछ विस्फोटक जानकारियां प्राप्त हुईं। प्रचार तंत्रों को दागदार-कलंकित-पिछड़े बिहार की जगह स्वच्छ, समृद्ध और विकासशील बिहार दिख रहा है! बिहार से बाहर रहने वाले बिहारीजन प्रदेश की इस नई छवि से स्वाभाविक रूप से पुलकित हैं। किंतु परदे के पीछे का सच पत्रकार बिरादरी के लिए भयावह है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल के लगभग साढ़े चार वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इस अवधि में बिहार के अखबार, वहां कार्यरत पत्रकार और विभिन्न टीवी चैनल नीतीश कुमार और बिहार का ऐसा चेहरा प्रस्तुत करते रहे मानो बिहार विकास के पायदान पर निरंतर छलांगें लगाता जा रहा है! जबकि साक्ष्य मौजूद हैं कि इसके पूर्व यही पत्रकार बिरादरी अन्य मुख्यमंत्रियों और बिहार को पिछड़ा, निकम्मा और एक अपराधी राज्य निरूपित करती रही थी। फिर अचानक क्या हो गया? क्या सचमुच नीतीश कुमार ने बिहार की तस्वीर बदल डाली है? बिहार अपराध मुक्त और बिहारी भयमुक्त हो चुके हैं? अब जातीय संघर्ष से दूर बिहार एक विकसित प्रदेश का दर्जा प्राप्त करने की ओर अग्रसर है? इस जिज्ञासा का जवाब लगभग 15 वर्ष पूर्व संपादक के पद से अवकाश प्राप्त कर चुके एक वरिष्ठ पत्रकार ने विगत कल सुबह दिया। जवाब से मैं स्तब्ध रह गया! उन्होंने कहा कि, ''नीतीश कुमार का बिहार विकास के लिए नहीं अपितु पत्रकारों के विनाश के लिए जाना जाएगा।'' नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में अखबारों, चैनलों और पत्रकारों का मुंह बंद रखने के लिए अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। बिल्कुल बंधुआ मजदूर बना रखा है उन्हें। नीतीश और बिहार का गुणगान करने पर बिरादरी खुश है- सुखी है। आरोप है कि वे सबकुछ कर रहे हैं सिवाय पत्रकारीय ईमानदारी के। कोई आश्चर्य नहीं कि इस तथ्य पर परदा डाल दिया गया है कि बिहारवासी नीतीश कुमार से क्रोधित हैं और अगले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी (जदयू) की खटिया खड़ी होने वाली है।कहते हैं यदाकदा जिन पत्रकारों ने सच को उजागर करने की कोशिश की, या तो उनका तबादला हो गया या तो फिर प्रबंधन की ओर से उन्हें शांत कर दिया गया। अखबारों, चैनलों को विज्ञापन के अलावा निजी तौर पर पत्रकारों को खुश रखने के लिए धन पानी की तरह बहाया गया। लेकिन कैसे? एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र की जुबान में सुन लें- ''....पांच लाख का विज्ञापन तो दिया जाता है किंतु साथ में पांच जूतों का बोनस भी।'' और तुर्रा यह कि पत्रकार खुशी-खुशी सह रहे हैं, स्वीकार कर रहे हैं।बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालूप्रसाद यादव ने बिहार के विकास के मुद्दे पर पत्रकारों को चुनौती दी है। लेकिन उनकी चुनौती को कोई स्वीकार नहीं कर रहा है। कारण स्पष्ट है। बंद मुंह खोलें तो कैसे? लालू ने एक वरिष्ठ पत्रकार के नवनिर्मित बंगले पर निर्माण खर्च का ब्यौरा सार्वजनिक रूप से मांगा है। स्वीमिंग पुल की सुविधायुक्त बंगला उस पत्रकार की माली हैसियत के दायरे में तो नहीं ही आता है। इसी प्रकार एक दैनिक में छपी उस रिपोर्ट को लालू ने चुनौती दी है जिसमें छोटे से शहर की एक लड़की को बिहार की कथित उपलब्धियों पर गर्व करते प्रस्तुत किया गया था। लालू ने चुनौती दी है कि संपादक उक्त लड़की को प्रस्तुत करें। लालू के अनुसार पूरी की पूरी यह 'स्टोरी' कपोलकल्पित है और लड़की एक काल्पनिक पात्र! उसका कोई वजूद ही नहीं है। अगर लालू का आरोप सही है तो निश्चय ही वह अखबार और संपादक नीतीश कुमार की दलाली कर रहा है। अविश्वसनीय तो लगता है जब सुनता हंू कि नीतीश कुमार सरकारी खजाने से सैकड़ों करोड़ रुपये समाचारपत्रों, टी.वी. चैनलों और पत्रकारों को उपकृत करने के लिए खर्च कर चुके हैं। क्या इस आरोप की जांच के लिए कभी कोई पहल होगी? उपकृत पत्रकार तो नहीं ही करेंगे, लेकिन अपवाद की श्रेणी में मौजूद ईमानदार पवित्र हाथ तो पहल कर ही सकते हैं।

अब पढ़ते हैं सुरेन्द्र किशोर जी की नीतीश कुमार और बिहार की पत्राकारिता पर राय.

कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार का शासन आने की प्रतीक्षा क्यों करता ?

प्रश्न - आपके बारे में यह कहा जाता है कि अपने पत्रकारिता जीवन में आपने कभी किसी मुख्यमंत्री की तारीफ नहीं की । क्या कारण है कि आप इन दिनों नीतीश कुमार के प्रशंसक बने हुए हैं ? इस अति प्रशंसा के कारण आपकी पुरानी छवि को धक्का लग रहा है?

उत्तर - आपने बिलकुल सही कहा। कुछ लोग तो नेट पर यह भी लिख रहे हैं कि मैं किसी तरह की ‘परसादी’ पाने के लिए नीतीश कुमार की चापलूसी कर रहा हूं। दरअसल ऐसे लोग न तो मुझे जानते हैं और न ही बिहार व देश के सामने आज जो गंभीर समस्याएं हैं, उनका उन्हें कोई अनुमान है। यदि किसी को अनुमान है भी तो वे स्वार्थ या किसी अन्य कारणवश उन्हें देख नहीं पा रहे हैं।यह बात सही नहीं है कि मैंने किसी मुख्यमंत्री की अपने लेखन में आम तौर पर कभी कोई सराहना ही नहीं की। जिस नेता के बारे में मुझे सबसे अधिक लिखने का मौका मिला, वे हैं लालू प्रसाद यादव। उन्होंने भी अपना काम किया और मेरे खिलाफ कुछ ऐसे कदम उठाए जो अभूतपूर्व रहे। इसके बावजूद 1990 में मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान मैंने लालू प्रसाद के पक्ष में और आरक्षण विरोधियों के खिलाफ लगातार जोरदार लेखन किया।इस लेखन के कारण मुझे अपने स्वजातीय, सवर्णों और यहां तक कि अपने परिजनों से भी आलोचनाएं सुननी पड़ी थीं। अनेक मुख्यमंत्रियों को देखने के बाद मैं यह कह सकता हूं कि नीतीश कुमार जैसा मुख्यमंत्री कुल मिलाकर इससे पहले मैंेने तो नहीं देखा। यदि यह बात मैं किसी लाभ की प्राप्ति के लिए कहूं तो मेरी इस बात पर किसी को ध्यान देने की जरूरत नहीं है। पर यदि राज्यहित में कह रहा हूं तो मेरी बात सुनी जानी चाहिए अन्यथा बाद में राज्य का नुकसान होगा। मंडल आरक्षण विवाद के समय मेरी बातें नहीं सुनी गईं जिसका नुकसान खुद उनको अधिक हुआ जो आरक्षण के खिलाफ आंदोलनरत थे। बाद में वे थान हार गये, पर पहले वे गज फाड़ने को तैयार नहीं थे। यदि 1990 में बिहार में आरक्षण का उस तरह अतार्किक विरोध नहीं हुआ होता तो लालू प्रसाद का दल 15 साल तक सत्ता में नहीं बना रहता। कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा अब भी यह कहते हैं कि ‘सुरेंद्र जी तब आरक्षण विरोधियों से कहा करते थे कि गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।’

प्रश्न - आपका लेखन इन दिनों नीतीश सरकार के पक्ष में एकतरफा लगता है। यह किसी पत्रकार के लिए अच्छा नहीं माना जाता। इस पर आपकी क्या राय है ? क्या नीतीश जी सारे काम ठीक ही कर रहे हैं ?

उत्तर - इस आरोप को एक हद तक में स्वीकरता हूं। हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है। नीतीश कुमार की सरकार की कुछ गलत नीतियों की मैंेने लिखकर समय-समय पर आलोचना की है। आगे भी यह स्वतंत्रता मैं अपने पास रिजर्व रखता हूं क्योंकि न तो मैंने खुद को कभी किसी के यहां गिरवी रखा है और न ही ऐसा कोई इरादा है। जब जीवन के कष्टपूर्ण क्षण मैंेने काट लिए तो अब किसी से किसी तरह के समझौते की जरूरत ही कहां है?यदि मैं किसी लाभ या लोभ के चक्कर में किसी सरकार या नेता का विरोध या समर्थन करूं तो जरूर मेरे नाम पर थूक दीजिएगा। पर यदि देश और प्रदेश के व्यापक हित में ऐसा करता हूं तो उसे उसी संदर्भ में देखनेे की जरूरत है।मैं पूछता हूं कि आजादी की लड़ाई के दिनों में क्या भारतीय पत्रकारों से यह सवाल पूछा जाता था कि आप आजादी की लड़ाई के पक्ष में एकतरफा क्यों हैं ? आज देश व प्रदेश में उससे मिलती-जुलती स्थिति है।खतरे उससे कई मामलों में अधिक गंभीर हैं। खतरा लोकतांत्रिक व्यवस्था की समाप्ति का है। खतरा अलोकतांत्रिक अतिवाद व आतंकवाद के काबिज हो जाने का है। इन दोनों खतरों को हमारे देश व प्रदेश के कुछ खास नेतागण अपने स्वार्थ में अंधा होकर जाने अनजाने आमंत्रित कर रहे हैं। इस स्थिति में जो नेता सुशासन लाने की कोशिश कर रहा है, जो नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाना चाहता है और भरसक उठा भी रहा है। और जो नेता सांप्रदायिक मसलों पर संतुलित रवैया अपनाता है, वही इन खतरों से सफलतापूर्वक लड़ भी सकता है। वैसे नेताओं के प्रति पक्षधरता दिखाना ही आज देशहित व राज्यहित है। लोकतंत्र बना रहेगा तभी तो स्वतंत्र प्रेस भी रहेगा।

सुरेन्द्र जी से पूरी बातचीत के लिए इस लिंक पर जाएँ..

पत्रकारिता के 40 साल पूरे कर चुके वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर से ‘ ‘प्रभात खबर ’ की बातचीत

अब फैसला आप सभी को सुनाना है..क्या बिहार के पत्रकार वाकई बिक गए हैं...क्या नीतीश ने बिहार में विकास नहीं किया...क्या बिहार की छवि उभरी नहीं है?

गुरुवार, मई 27, 2010

ब्लॉग लेखन : हिंदी का अहित करने वाला अश्लील कर्म ?

आज कथाक्रम पत्रिका का अप्रैल-जून अंक पढ़ रहा था..पत्रिका के संपादक शैलेन्द्र सागर जी ने वर्तमान अंक में ब्लॉग की विसंगतियों पर "ब्लॉग पर कुछ ट्वीटिंग" शीर्षक से सम्पादकीय लिखा है. सम्पादकीय पढने से यही मालूम होता है कि ब्लॉग लेखन सागर जी के लिए पहले एक गंभीर रचनाकर्म था..पर अब कतिपय ब्लॉग पर विचरने के बाद यह उनके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आढ़ में हिंदी का अहित करने वाला अश्लील कर्म है. आपकी सुविधा के लिए नीचे लिंक दिया जा रहा है आप कथाक्रम के साईट पर जाकर सीधा इस लेख को पढ़ सकते है...
http://www.kathakram.in/may/sampadakiya.pdf