एक पत्रकार नागपुर में रहते हैं और एक बिहार में.. नागपुर में रहने वाले पत्रकार महोदय एस.एन.विनोद हैं वही बिहार में रहने वाले पत्रकार सुरेन्द्र किशोर जी हैं...एस.एन.विनोद की माने तो बिहार में कोई विकास या काम नहीं हो रहा (क्योंकि उनके किसी मित्र ने उन्हें फ़ोन पर बताया है)...वे इसी आधार पर बिहार के पत्रकारों पर आरोप लगा कर कहते हैं कि बिहार के पत्रकार बिके हुए है..जो पैसो के बल पर विकास का भ्रम मात्र पैदा कर रहे हैं...विनोद जी ने अपने ब्लॉग चीर फाड़ पर पत्रकारों को गरियाने के लिए लालू प्रसाद का हवाला भी दिया है.
वही हमेशा से मुख्यमंत्रियों की आलोचना करते रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र किशोर जी की माने तो बिहार में वाकई काम हो रहा है और उन्हें कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार के शासन आने की प्रतीक्षा क्यों करते.. ?
अब सवाल यह उठता है कि क्या वाकई नीतीश ने पत्रकारिता का उपयोग करके विकास का भ्रम पैदा कर रखा है या एस.एन.विनोद (नागपुर) और बिहार के बीच फासला और एक संपादक मित्र के फ़ोन कॉल ने नीतीश के सारे विकास कार्यो पर पर्दा दाल दिया है..
पहले पढ़ते हैं एस.एन.विनोद का आलेख उन्ही के ब्लॉग चीर फाड़ से...
नीतीश का बिहार, नीतीश के पत्रकार!
अब इस विडंबना पर हंसूं या रोऊं? एक समय था जब पत्रकार राजनेताओं अर्थात्ï पॉलिटिशियन्स को भ्रष्ट, चोर, दलाल निरूपित किया करते थे। वैसे करते तो आज भी हैं, किंतु अब राजनेता पत्रकारों को भ्रष्ट, चोर, दलाल, निरूपित करने लगे हैं। क्यों और कैसे पैदा हुई ऐसी स्थिति? तथ्य बतात हैं कि स्वयं पत्रकार ऐसे अवसर उपलब्ध करवा रहे हैं। इस संदर्भ में बिहार से कुछ विस्फोटक जानकारियां प्राप्त हुईं। प्रचार तंत्रों को दागदार-कलंकित-पिछड़े बिहार की जगह स्वच्छ, समृद्ध और विकासशील बिहार दिख रहा है! बिहार से बाहर रहने वाले बिहारीजन प्रदेश की इस नई छवि से स्वाभाविक रूप से पुलकित हैं। किंतु परदे के पीछे का सच पत्रकार बिरादरी के लिए भयावह है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल के लगभग साढ़े चार वर्ष पूर्ण हो चुके हैं। इस अवधि में बिहार के अखबार, वहां कार्यरत पत्रकार और विभिन्न टीवी चैनल नीतीश कुमार और बिहार का ऐसा चेहरा प्रस्तुत करते रहे मानो बिहार विकास के पायदान पर निरंतर छलांगें लगाता जा रहा है! जबकि साक्ष्य मौजूद हैं कि इसके पूर्व यही पत्रकार बिरादरी अन्य मुख्यमंत्रियों और बिहार को पिछड़ा, निकम्मा और एक अपराधी राज्य निरूपित करती रही थी। फिर अचानक क्या हो गया? क्या सचमुच नीतीश कुमार ने बिहार की तस्वीर बदल डाली है? बिहार अपराध मुक्त और बिहारी भयमुक्त हो चुके हैं? अब जातीय संघर्ष से दूर बिहार एक विकसित प्रदेश का दर्जा प्राप्त करने की ओर अग्रसर है? इस जिज्ञासा का जवाब लगभग 15 वर्ष पूर्व संपादक के पद से अवकाश प्राप्त कर चुके एक वरिष्ठ पत्रकार ने विगत कल सुबह दिया। जवाब से मैं स्तब्ध रह गया! उन्होंने कहा कि, ''नीतीश कुमार का बिहार विकास के लिए नहीं अपितु पत्रकारों के विनाश के लिए जाना जाएगा।'' नीतीश कुमार ने अपने कार्यकाल में अखबारों, चैनलों और पत्रकारों का मुंह बंद रखने के लिए अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। बिल्कुल बंधुआ मजदूर बना रखा है उन्हें। नीतीश और बिहार का गुणगान करने पर बिरादरी खुश है- सुखी है। आरोप है कि वे सबकुछ कर रहे हैं सिवाय पत्रकारीय ईमानदारी के। कोई आश्चर्य नहीं कि इस तथ्य पर परदा डाल दिया गया है कि बिहारवासी नीतीश कुमार से क्रोधित हैं और अगले विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की पार्टी (जदयू) की खटिया खड़ी होने वाली है।कहते हैं यदाकदा जिन पत्रकारों ने सच को उजागर करने की कोशिश की, या तो उनका तबादला हो गया या तो फिर प्रबंधन की ओर से उन्हें शांत कर दिया गया। अखबारों, चैनलों को विज्ञापन के अलावा निजी तौर पर पत्रकारों को खुश रखने के लिए धन पानी की तरह बहाया गया। लेकिन कैसे? एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र की जुबान में सुन लें- ''....पांच लाख का विज्ञापन तो दिया जाता है किंतु साथ में पांच जूतों का बोनस भी।'' और तुर्रा यह कि पत्रकार खुशी-खुशी सह रहे हैं, स्वीकार कर रहे हैं।बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालूप्रसाद यादव ने बिहार के विकास के मुद्दे पर पत्रकारों को चुनौती दी है। लेकिन उनकी चुनौती को कोई स्वीकार नहीं कर रहा है। कारण स्पष्ट है। बंद मुंह खोलें तो कैसे? लालू ने एक वरिष्ठ पत्रकार के नवनिर्मित बंगले पर निर्माण खर्च का ब्यौरा सार्वजनिक रूप से मांगा है। स्वीमिंग पुल की सुविधायुक्त बंगला उस पत्रकार की माली हैसियत के दायरे में तो नहीं ही आता है। इसी प्रकार एक दैनिक में छपी उस रिपोर्ट को लालू ने चुनौती दी है जिसमें छोटे से शहर की एक लड़की को बिहार की कथित उपलब्धियों पर गर्व करते प्रस्तुत किया गया था। लालू ने चुनौती दी है कि संपादक उक्त लड़की को प्रस्तुत करें। लालू के अनुसार पूरी की पूरी यह 'स्टोरी' कपोलकल्पित है और लड़की एक काल्पनिक पात्र! उसका कोई वजूद ही नहीं है। अगर लालू का आरोप सही है तो निश्चय ही वह अखबार और संपादक नीतीश कुमार की दलाली कर रहा है। अविश्वसनीय तो लगता है जब सुनता हंू कि नीतीश कुमार सरकारी खजाने से सैकड़ों करोड़ रुपये समाचारपत्रों, टी.वी. चैनलों और पत्रकारों को उपकृत करने के लिए खर्च कर चुके हैं। क्या इस आरोप की जांच के लिए कभी कोई पहल होगी? उपकृत पत्रकार तो नहीं ही करेंगे, लेकिन अपवाद की श्रेणी में मौजूद ईमानदार पवित्र हाथ तो पहल कर ही सकते हैं।
अब पढ़ते हैं सुरेन्द्र किशोर जी की नीतीश कुमार और बिहार की पत्राकारिता पर राय.
कोई सरकारी परसादी लेनी होती तो नीतीश कुमार का शासन आने की प्रतीक्षा क्यों करता ?
प्रश्न - आपके बारे में यह कहा जाता है कि अपने पत्रकारिता जीवन में आपने कभी किसी मुख्यमंत्री की तारीफ नहीं की । क्या कारण है कि आप इन दिनों नीतीश कुमार के प्रशंसक बने हुए हैं ? इस अति प्रशंसा के कारण आपकी पुरानी छवि को धक्का लग रहा है?
उत्तर - आपने बिलकुल सही कहा। कुछ लोग तो नेट पर यह भी लिख रहे हैं कि मैं किसी तरह की ‘परसादी’ पाने के लिए नीतीश कुमार की चापलूसी कर रहा हूं। दरअसल ऐसे लोग न तो मुझे जानते हैं और न ही बिहार व देश के सामने आज जो गंभीर समस्याएं हैं, उनका उन्हें कोई अनुमान है। यदि किसी को अनुमान है भी तो वे स्वार्थ या किसी अन्य कारणवश उन्हें देख नहीं पा रहे हैं।यह बात सही नहीं है कि मैंने किसी मुख्यमंत्री की अपने लेखन में आम तौर पर कभी कोई सराहना ही नहीं की। जिस नेता के बारे में मुझे सबसे अधिक लिखने का मौका मिला, वे हैं लालू प्रसाद यादव। उन्होंने भी अपना काम किया और मेरे खिलाफ कुछ ऐसे कदम उठाए जो अभूतपूर्व रहे। इसके बावजूद 1990 में मंडल आरक्षण आंदोलन के दौरान मैंने लालू प्रसाद के पक्ष में और आरक्षण विरोधियों के खिलाफ लगातार जोरदार लेखन किया।इस लेखन के कारण मुझे अपने स्वजातीय, सवर्णों और यहां तक कि अपने परिजनों से भी आलोचनाएं सुननी पड़ी थीं। अनेक मुख्यमंत्रियों को देखने के बाद मैं यह कह सकता हूं कि नीतीश कुमार जैसा मुख्यमंत्री कुल मिलाकर इससे पहले मैंेने तो नहीं देखा। यदि यह बात मैं किसी लाभ की प्राप्ति के लिए कहूं तो मेरी इस बात पर किसी को ध्यान देने की जरूरत नहीं है। पर यदि राज्यहित में कह रहा हूं तो मेरी बात सुनी जानी चाहिए अन्यथा बाद में राज्य का नुकसान होगा। मंडल आरक्षण विवाद के समय मेरी बातें नहीं सुनी गईं जिसका नुकसान खुद उनको अधिक हुआ जो आरक्षण के खिलाफ आंदोलनरत थे। बाद में वे थान हार गये, पर पहले वे गज फाड़ने को तैयार नहीं थे। यदि 1990 में बिहार में आरक्षण का उस तरह अतार्किक विरोध नहीं हुआ होता तो लालू प्रसाद का दल 15 साल तक सत्ता में नहीं बना रहता। कांग्रेस के पूर्व विधायक हरखू झा अब भी यह कहते हैं कि ‘सुरेंद्र जी तब आरक्षण विरोधियों से कहा करते थे कि गज नहीं फाड़ोगे तो थान हारना पड़ेगा।’
प्रश्न - आपका लेखन इन दिनों नीतीश सरकार के पक्ष में एकतरफा लगता है। यह किसी पत्रकार के लिए अच्छा नहीं माना जाता। इस पर आपकी क्या राय है ? क्या नीतीश जी सारे काम ठीक ही कर रहे हैं ?
उत्तर - इस आरोप को एक हद तक में स्वीकरता हूं। हालांकि यह पूरी तरह सच नहीं है। नीतीश कुमार की सरकार की कुछ गलत नीतियों की मैंेने लिखकर समय-समय पर आलोचना की है। आगे भी यह स्वतंत्रता मैं अपने पास रिजर्व रखता हूं क्योंकि न तो मैंने खुद को कभी किसी के यहां गिरवी रखा है और न ही ऐसा कोई इरादा है। जब जीवन के कष्टपूर्ण क्षण मैंेने काट लिए तो अब किसी से किसी तरह के समझौते की जरूरत ही कहां है?यदि मैं किसी लाभ या लोभ के चक्कर में किसी सरकार या नेता का विरोध या समर्थन करूं तो जरूर मेरे नाम पर थूक दीजिएगा। पर यदि देश और प्रदेश के व्यापक हित में ऐसा करता हूं तो उसे उसी संदर्भ में देखनेे की जरूरत है।मैं पूछता हूं कि आजादी की लड़ाई के दिनों में क्या भारतीय पत्रकारों से यह सवाल पूछा जाता था कि आप आजादी की लड़ाई के पक्ष में एकतरफा क्यों हैं ? आज देश व प्रदेश में उससे मिलती-जुलती स्थिति है।खतरे उससे कई मामलों में अधिक गंभीर हैं। खतरा लोकतांत्रिक व्यवस्था की समाप्ति का है। खतरा अलोकतांत्रिक अतिवाद व आतंकवाद के काबिज हो जाने का है। इन दोनों खतरों को हमारे देश व प्रदेश के कुछ खास नेतागण अपने स्वार्थ में अंधा होकर जाने अनजाने आमंत्रित कर रहे हैं। इस स्थिति में जो नेता सुशासन लाने की कोशिश कर रहा है, जो नेता भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े कदम उठाना चाहता है और भरसक उठा भी रहा है। और जो नेता सांप्रदायिक मसलों पर संतुलित रवैया अपनाता है, वही इन खतरों से सफलतापूर्वक लड़ भी सकता है। वैसे नेताओं के प्रति पक्षधरता दिखाना ही आज देशहित व राज्यहित है। लोकतंत्र बना रहेगा तभी तो स्वतंत्र प्रेस भी रहेगा।
सुरेन्द्र जी से पूरी बातचीत के लिए इस लिंक पर जाएँ..
पत्रकारिता के 40 साल पूरे कर चुके वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर से ‘ ‘प्रभात खबर ’ की बातचीत
अब फैसला आप सभी को सुनाना है..क्या बिहार के पत्रकार वाकई बिक गए हैं...क्या नीतीश ने बिहार में विकास नहीं किया...क्या बिहार की छवि उभरी नहीं है?