सच हम नहीं, सच तुम नहीं, सच है महज संघर्ष ही!
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मंगलवार, अक्टूबर 25, 2011

कन्फ्यूश ! बिहार के मुखिया नीतीश कुमार

बेगानों की शादी में अब्दुल्ला दीवाना बने या बेगाना….कन्फ्युशन है! क्योंकि, बीते दिनों बिहार के मुखिया नीतीश कुमार दिल्ली में राष्ट्रीय विकास परिषद् की बैठक में जो बोले उसने भी कन्फ्यूश कर दिया. दरअसल, सुशासन बाबू ने यह कहा कि केंद्र सरकार आर.टी.ई., बीज व खाद्य सुरक्षा विधयेक, पात्रता विधेयक जैसे जो भी कानून बना रही है वह राज्यों के क्षमता को देखे बगैर बना रही है. जो कि संघीय ढांचे के खिलाफ है. बात तो सही है नीतीश जी ने जो कहा वह लाख टके की बात है. पर कन्फ्युशन इसलिए है कि नीतीश कुमार वैसे कानूनों का विरोध करने के बजाये उन्हें सूबे में फटाफट लागू करते जा रहे हैं. जबकि यह सत्य है कि बिहार अभी भी पिछड़ा राज्य है..जिसके लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग भी वे ही कर रहे हैं..और कानून पर कानून भी लागू कर रहे हैं. लिहाजा, पिस रही है आम जनता.
सो, मै इस सोच में पड़ गया हूँ कि सुशासन बाबू अब्दुल्ला दीवाना हैं या बेगाना!


- सौरभ के.स्वतंत्र


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रविवार, अक्टूबर 23, 2011

बिहार में सी-कम्पनी का फिर खौफ!





  • बढ़ते अपराध को ले पुलिस के बजाये मीडिया पर बरसते नीतीश!

  • फिर पनप रहा है अपरहण उद्योग!


सौरभ के.स्वतंत्र



सुशासन बाबू के नाम से विख्यात नीतीश कुमार के २००४ में सत्ता में आने के बाद बिहार को एक नयी उम्मीद की किरण दिखी. मसलन, अब बिहार से जंगल राज समाप्त हो रहा है..अपराध का ग्राफ गिर रहा है…वंचितों को न्याय मिल रहा है…इसी बेस पर सुशासन बाबू दूसरी पारी खेलने में सफल हुए..पर इन दिनों सूबे का आलम यह है कि सी-कम्पनी यानी कास्ट, क्राइम और करप्शन फिर सिर उठा रहा है..आये दिन हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं. मुख्यमंत्री सूबे के सारे एस.पी. और डी.आई.जी. की मैराथन बैठक कर रहे हैं..पर अपहरण, बलात्कार, हत्या के मामले थम नहीं रहे. मुख्यमंत्री पुलिस अधिकारियो की बैठक में किसी भी एस.पी. और डी.आई.जी को डांट पिलाने के बजाये मीडिया पर एकतरफा वार करते दिख रहे हैं. मुख्यमंत्री का मानना है कि मीडिया सिर्फ एकपक्षीय खबर दिखा रहा है..
इस लिहाज से यह कहना सर्वथा उचित होगा कि सरकार अवसरवादी हो गयी है. मेरी तो सरकार को यही राय है कि उसे यह मान लेना चाहिए कि नीतीश कुमार को जो लोकप्रियता व हाइप मिला है उसके पीछे मीडिया का ही हाथ है..अब जब सरकार नाकाम होती दिख रही तो भी मीडिया से ऐसी उम्मीद का भ्रम पाले रखना निहायत अलोकतांत्रिक है. सच तो सच है..पर्दा क्यों..?



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